वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान (Iran-US) के बीच शांति समझौते के बावजूद कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे अमेरिका के लिए अधूरी सफलता मान रहे हैं। उनका कहना है कि समझौते के बाद भी अमेरिका (US) अपने प्रमुख लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया और हालात लगभग युद्ध से पहले जैसी स्थिति में लौटते दिखाई दे रहे हैं।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीजके पश्चिम एशिया कार्यक्रम से जुड़े वरिष्ठ फेलो टॉडमैन का मानना है कि मौजूदा समझौता मूल रूप से युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने तक सीमित नजर आता है। उनके अनुसार, अगले 60 दिनों में होने वाली वार्ताएं तय करेंगी कि अमेरिका को इस संघर्ष और भारी नुकसान के बाद कोई ठोस रणनीतिक लाभ मिलता है या नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई की शुरुआत जिन बड़े उद्देश्यों के साथ की थी, वे अब तक पूरे नहीं हो सके हैं। टॉडमैन के मुताबिक, फिलहाल स्थिति वही दिख रही है जो अमेरिका और इजरायल के हमलों से पहले थी।
अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति बनी, जिससे वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, समझौते की पूरी शर्तें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, औपचारिक हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को Switzerland में आयोजित हो सकता है, जिसके बाद इसे लागू किया जाएगा।
समझौते में ईरान के उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम भंडार और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादित मुद्दों पर 60 दिनों की बातचीत का प्रावधान रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही अवधि तय करेगी कि अमेरिका अपने सबसे अहम लक्ष्य—ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश—को हासिल कर पाता है या नहीं।
टॉडमैन का कहना है कि ईरान इस मुद्दे पर बड़े समझौते के मूड में नहीं दिखता। उनका मानना है कि तेहरान वार्ताओं को लंबा खींच सकता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रंप दोबारा सैन्य कार्रवाई से बचेंगे। ऐसे में अमेरिका के लिए अपने रणनीतिक उद्देश्य हासिल करना आसान नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते के बाद ईरान की पश्चिम एशिया में आर्थिक भागीदारी और मजबूत हो सकती है। अरब खाड़ी देश भविष्य के टकराव से बचने के लिए तेहरान के साथ आर्थिक रिश्ते बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय समीकरण बदलने की संभावना है।
विश्लेषकों का कहना है कि तीन महीने से ज्यादा चले संघर्ष ने अमेरिका के कई पारंपरिक साझेदारों के साथ रिश्तों पर असर डाला है। अरब खाड़ी देशों को महसूस हुआ कि युद्ध के दौरान उनकी सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसके चलते वे सुरक्षा साझेदारी के नए विकल्प तलाश सकते हैं, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सके।
टॉडमैन के मुताबिक, अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी मतभेद बढ़े हैं। कई पश्चिमी देशों ने इस सैन्य कार्रवाई का खुला समर्थन नहीं किया था। इसी बीच, ट्रंप की ओर से NATO की सार्वजनिक आलोचना ने ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में नई खटास पैदा कर दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और इजरायल के रणनीतिक हितों में भी मतभेद सामने आने लगे हैं। Benjamin Netanyahu सरकार को आशंका है कि मौजूदा समझौता ईरान से पैदा होने वाले खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं करता और भविष्य में इजरायल की स्वतंत्र सैन्य कार्रवाई की क्षमता को भी सीमित कर सकता है।
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