
नई दिल्ली। इजरायल (Israel) के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (PM Benjamin Netanyahu) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) के साथ अपने संबंधों पर खुलकर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के नेता हमेशा एक-दूसरे की हर बात से सहमत नहीं होते, क्योंकि वे स्वतंत्र और संप्रभु देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
एक अंतरराष्ट्रीय नीति सम्मेलन में बोलते हुए नेतन्याहू ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप वह सब नहीं करते जो मैं चाहता हूं, और न ही मैं वह सब करता हूं जो वे चाहते हैं। हम स्वतंत्र और गर्व करने वाले देशों के नेता हैं, इसलिए कई बार हमारे दृष्टिकोण अलग होते हैं।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब मिडिल ईस्ट में सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं।
क्षेत्रीय तनाव के बीच बयान का महत्व
इजरायल इस समय हमास, हिज्बुल्लाह और ईरान समर्थित समूहों से जुड़े सुरक्षा खतरों का सामना कर रहा है। अमेरिका लंबे समय से इजरायल का प्रमुख सहयोगी रहा है, लेकिन कई मौकों पर दोनों देशों के बीच नीतिगत मतभेद भी सामने आते रहे हैं। नेतन्याहू का यह बयान इन्हीं जटिल रिश्तों की ओर संकेत करता है।
अमेरिका-ईरान वार्ता में बड़ा खुलासा
इसी बीच ईरान और अमेरिका के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत को लेकर नई जानकारी सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच करीब 18 घंटे तक लंबी बातचीत हुई, जिसमें कई अहम मुद्दों पर चर्चा की गई।
ईरानी प्रवक्ता ने बताया कि अब आगे की प्रक्रिया तकनीकी विशेषज्ञ टीमों के स्तर पर जारी रहेगी। बातचीत में कतर और पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और अब वे एक लिखित दस्तावेज तैयार करेंगे, जिसमें शुरुआती सहमतियों का ब्यौरा होगा।
ईरान की प्रमुख मांगें
ईरान ने बातचीत के दौरान दो प्रमुख मुद्दों पर जोर दिया है। पहला, वह चाहता है कि उसे अपने तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों में राहत मिले ताकि वह स्वतंत्र रूप से तेल बेच सके।
दूसरा मुद्दा उसके फ्रीज किए गए वित्तीय संसाधनों से जुड़ा है। ईरान का कहना है कि उसके अरबों डॉलर विभिन्न देशों में अटके हुए हैं, जिन्हें वह ‘फ्रोजन एसेट्स’ के रूप में वापस चाहता है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि इन दोनों मुद्दों का समाधान वार्ता की सफलता के लिए बेहद जरूरी है।
बातचीत जारी, लेकिन सहमति अधूरी
हालांकि 18 घंटे की लंबी वार्ता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन अभी किसी ठोस समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल एक शुरुआती चरण है और आगे की प्रक्रिया तकनीकी वार्ताओं पर निर्भर करेगी।
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