वाशिंगटन। रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी कोशिशों (American efforts) के बीच एक अहम प्रतिबंध विधेयक अमेरिकी सीनेट (US Senate) में आगे बढ़ गया है। इस घटनाक्रम ने भारत समेत उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो अभी भी रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा आयात कर रहे हैं। यदि यह विधेयक आगे चलकर कानून बनता है तो भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने की संभावना पैदा हो सकती है।
यह विधेयक रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसके ऊर्जा निर्यात से होने वाली आय को सीमित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। प्रस्तावित प्रावधानों के तहत रूस से तेल और ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर कड़े आर्थिक कदम उठाने का रास्ता खुल सकता है।
रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में भारत प्रमुख आयातकों में शामिल है। चीन के बाद भारत रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में गिना जाता है। इसी वजह से प्रस्तावित कानून के दायरे में भारत का नाम भी उन देशों में शामिल किया गया है, जिन पर जरूरत पड़ने पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
सीनेट में विधेयक को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव के समर्थन में 86 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 12 सांसद इसके विरोध में रहे।
हालांकि यह विधेयक अभी अंतिम रूप से कानून नहीं बना है। फिलहाल इसे सीनेट में बहस और अंतिम मतदान के लिए आगे बढ़ाने की मंजूरी मिली है। बताया जा रहा है कि 60 से अधिक सीनेटर इसके सह-प्रायोजक हैं, जिससे इसके पारित होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
यदि सीनेट से अंतिम मंजूरी मिलती है तो इसे अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स भेजा जाएगा। वहां से पारित होने के बाद यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून बन जाएगा और रूस के खिलाफ प्रतिबंध लागू किए जा सकेंगे। टैरिफ लागू करने का अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में रहेगा और कुछ देशों या विशेष परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान भी मौजूद है।
यह विधेयक ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने के बाद भारत ने वैकल्पिक स्रोत के रूप में रूसी तेल की खरीद बढ़ाई है।
ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से आयात बढ़ाया, जिससे रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया।
सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने पहले संकेत दिया था कि जिन देशों का रूसी गैस आयात कुल आयात का 15 प्रतिशत से कम है, उन्हें कुछ मामलों में राहत मिल सकती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य कुछ यूरोपीय सहयोगी देशों को प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाना बताया गया है।
भारत और अमेरिका के बीच इस समय व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे में यदि भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है तो दोनों देशों के आर्थिक और व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे द्विपक्षीय व्यापार वार्ता की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका पहले भी भारत सहित कई देशों से आयातित वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला कर चुका है। बंधुआ मजदूरी से जुड़े प्रावधानों के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लागू किया गया था। अमेरिकी प्रशासन का कहना था कि यह कदम श्रम मानकों को सख्त बनाने और संबंधित देशों को आवश्यक सुधारों के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उठाया गया था।
अब रूस प्रतिबंध विधेयक के आगे बढ़ने के बाद भारत की नजर अमेरिकी संसद की अगली प्रक्रिया और राष्ट्रपति के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका असर केवल ऊर्जा व्यापार ही नहीं बल्कि दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों पर भी पड़ सकता है।
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