
सलाखों से मिली सीख, आजादी ने दिया नया जीवन
इन्दौर निलेश राठौर।
आजादी (freedom) का मतलब हर किसी के लिए अलग हो सकता है। किसी के लिए यह देश की स्वतंत्रता का पर्व है तो किसी के लिए वर्षों बाद जेल की सलाखों से बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेना। स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) पर सेन्ट्रल जेल (Central Jail) से रिहा हुए 11 बंदियों के लिए कल का दिन कुछ ऐसा ही था। हाथ में सामान की छोटी-सी गठरी, आंखों में बीते वर्षों की तस्वीरें और दिल में एक संकल्प— अब जिंदगी दोबारा अपराध की ओर नहीं जाएगी।
अग्निबाण से बातचीत में रिहा हुए बंदियों ने अपने जीवन के वे पन्ने खोले, जिन्हें याद करना भी उनके लिए आसान नहीं था। किसी ने जमीन के विवाद में पलभर के गुस्से में ऐसा कदम उठा लिया कि हाथ खून से रंग गए। किसी को पत्नी की आत्महत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काटनी पड़ी। किसी ने पिता के अपराध का बोझ अपने सिर ले लिया, जबकि कुछ बंदियों ने ऐसे अपराध की सजा में जेल में जीवन के कीमती साल गुजार दिए, जिनमें बाद में सबूतों के अभाव में वे बेगुनाह साबित हुए।
वह एक पल… जिसने जिंदगी बदल दी
इन बंदियों की बातों में एक दर्द बार-बार सामने आया—काश उस दिन गुस्से के उस एक पल खुद पर काबू कर लिया होता। उनका कहना था कि अपराध करने के बाद गुस्सा खत्म हो जाता है, लेकिन उसके परिणाम जिंदगीभर पीछा करते हैं। जब आवेश उतरता है और इंसान को अपने किए का एहसास होता है, तब तक बहुत कुछ खत्म हो चुका होता है। रिहा बंदियों ने कहा कि जेल में रहते हुए सबसे ज्यादा तकलीफ सजा की नहीं, बल्कि परिवार से दूर रहने और अपने किए पर पछताने की होती है। उन्होंने माना कि यदि उस एक पल धैर्य रखा होता तो आज समाज उन्हें अपराधी के रूप में नहीं जानता।
सलाखों के पीछे बीते साल बने सबक
वर्षों की कैद ने इन बंदियों को यह समझाया कि आजादी कितनी अनमोल है। परिवार के साथ बैठना, अपनों से बात करना, सुबह खुले आसमान के नीचे निकलना— ये छोटी लगने वाली चीजें जेल के भीतर सबसे बड़ी खुशियां बन जाती हैं। अब रिहा हुए इन बंदियों ने अपने अतीत से तौबा करते हुए नई जिंदगी की शुरुआत का संकल्प लिया है। उनका कहना है कि वे मेहनत करेंगे, परिवार का सहारा बनेंगे और समाज में जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाएंगे।
रिहा बंदियों की दर्दभरी कहानी उन्ही की जुबानी
कल वर्षों की कैद से आजाद हुए राजू गंगाराम ने बताया कि मैंने पत्नी को थप्पड़ जड़ दिया था, जिससे नाराज होकर उसने आत्महत्या कर ली थी। जिसकी सजा मुझे वर्षों जेल में रहकर गुजारना पड़ी। जमीन के विवाद में अपने भाई कैलाश के साथ खून से हाथ रंगने वाले पर्वत ने बताया कि भगवान किसी से ऐसा अपराध ना करवाए, क्योंकि जेल में रहकर हमने जो खोया वह हम शब्दों में नहीं बता सकते हैं। कमल निवासी खरगोन ने बताया कि वह भी खेती को लेकर हुए विवाद में हत्यारा बन बैठा। अब मैं अच्छा नागरिक बन सुख-चैन से गुजर-बसर करूंगा। इसी तरह श्यामलाल निवासी परदेशीपुरा ने राजनीति विवाद में हुई हत्या में सबूतों के अभाव में बेगुनाह होते हुए सजा पाई, वहीं गणेश निवासी इन्दौर ने बताया कि पिता शंकर के साथ उसे भी हत्या का आरोपी बना दिया, मगर उसने अपराध नहीं किया था। इसी तरह झाबुआ में रहने वाले बबला रत्ना ने गांव में हुई हत्या में सबूतों के अभाव में बेगुनाह होते हुए सजा काटी। जेल अधीक्षक दिनेश नरगावे ने सभी रिहा बंदियों को अच्छा नागरिक बनने की सीख दी। उपजेल अधीक्षक संतोष लडिय़ा और उन्होंने जेल जो रुपए में कमाएं उन्हें सौंपे।
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