
नई दिल्ली। केरल (Kerala) में महिलाओं (Women) की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक मंचों पर पुरुषों (Men) के साथ महिलाओं के मौजूद रहने के खिलाफ जारी एक सर्कुलर के बाद अब इस्लामिक स्कॉलर कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार (Islamic scholar Kanthapuram A.P. Aboobacker Musliyar) ने महिलाओं को घरों तक सीमित रहने की सलाह दी है। कोच्चि में रविवार को एक इस्लामिक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर लाने से ‘बड़ी तबाही’ होगी और इस्लाम में इसे रोकने के लिए महिलाओं के लिए पर्दे का प्रावधान किया गया है।
मंच साझा करने को लेकर पहले जारी हुआ था सर्कुलर
दरअसल, समस्थ केरल जमीयतुल उलेमा के कंथापुरम गुट ने पिछले सप्ताह धार्मिक समारोहों और कार्यक्रमों को तय सीमाओं के भीतर आयोजित करने की बात कही थी। संगठन के अध्यक्ष ई. सुलेमान मुसलियार और महासचिव कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने निर्देश दिया था कि महिलाएं पुरुषों के साथ मंच साझा न करें और सार्वजनिक जगहों पर उनके साथ नजर न आएं। इस सर्कुलर के सामने आने के बाद विवाद शुरू हो गया था। कई महिला राजनीतिक नेताओं ने भी इसका विरोध करते हुए सवाल उठाए थे।
‘महिलाओं को मंच पर लाने से बड़ी तबाही होगी’
रविवार को कोच्चि में आयोजित सम्मेलन में कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने अपने विचार दोहराते हुए कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर लाने से बड़ी तबाही हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से इस्लाम में महिलाओं के लिए पर्दे का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा, “महिलाओं को इस तरह सार्वजनिक मंचों पर लाने से बड़ी तबाही होती है, इसलिए इस्लाम ने महिलाओं के लिए पर्दा अनिवार्य किया है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि पवित्र कुरान में महिलाओं को अपने घरों तक सीमित रहने और सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने की बात कही गई है। कंथापुरम ने कहा कि इस तरह की शिक्षा पिछले 100 वर्षों से धार्मिक विद्वानों, खासकर समस्थ के नेताओं की ओर से दी जाती रही है।
‘विरोध के बावजूद अपनी बात कहते रहेंगे’
कंथापुरम ने कहा कि धार्मिक विद्वानों की जिम्मेदारी है कि वे धर्म से जुड़े ऐसे मुद्दों पर अपनी बात रखें। उन्होंने कहा कि अगर दूसरे संगठनों या समस्थ के नेता भी इन विचारों का विरोध या सवाल करते हैं, तब भी वे अपनी बात कहते रहेंगे।
उन्होंने कहा, “हम इसे कहेंगे और कहते रहेंगे। कोई हमें रोक नहीं सकता।” महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी और धार्मिक आयोजनों में उनकी भूमिका को लेकर दिए गए इन बयानों ने केरल में एक बार फिर सामाजिक और राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
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