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एक देश, दो हिस्से और तीन दशक की हिंसा: ट्रंप के बयान से फिर चर्चा में आयरलैंड का एकीकरण, जानिए विवाद की पूरी कहानी

September 14, 2026

डूनबेग। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एकीकृत आयरलैंड के समर्थन में दिए गए बयान ने ब्रिटेन और आयरलैंड (Britain and Ireland) के बीच करीब एक सदी पुराने संवेदनशील मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आयरलैंड की आजादी के बाद उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन का हिस्सा बना रहा। इसके बाद वहां राष्ट्रवादियों और संघवादियों के बीच दशकों तक राजनीतिक तनाव और हिंसा का दौर चला।

ट्रंप ने आयरलैंड यात्रा के दौरान उत्तरी आयरलैंड को आयरलैंड गणराज्य के साथ मिलाकर एक देश बनाने के विचार का समर्थन किया। रविवार को डूनबेग स्थित अपने गोल्फ कोर्स पर आयरिश ओपन के दौरान उन्होंने कहा कि आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड का एक होना दुनिया की सबसे स्वाभाविक चीजों में से एक होगा। इससे एक दिन पहले भी उन्होंने एकीकृत आयरलैंड को ‘शानदार’ बताया था।

हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत विचार है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस विचार के लिए काफी समर्थन मिला है। लेकिन उत्तरी आयरलैंड का ब्रिटेन में बने रहना या आयरलैंड के साथ जुड़ना केवल भौगोलिक सीमाओं का सवाल नहीं है। इसके पीछे करीब एक सदी का इतिहास, धार्मिक-सामुदायिक पहचान और तीन दशक की हिंसा जुड़ी है।


  • आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड अलग क्यों हुए?

    इस विवाद की जड़ें करीब एक सदी पुरानी हैं। आयरलैंड ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल कर एक स्वशासित देश का रूप लिया। लेकिन उत्तर में स्थित छह काउंटी ब्रिटेन के साथ ही रहीं। यही क्षेत्र आज उत्तरी आयरलैंड कहलाता है।

    इसके बाद उत्तरी आयरलैंड में दो प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक समूह उभरे। राष्ट्रवादियों में अधिकांश कैथोलिक थे और वे उत्तरी आयरलैंड का आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते थे। दूसरी ओर मुख्य रूप से प्रोटेस्टेंट संघवादी थे, जो उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन का हिस्सा बनाए रखने के पक्षधर थे।

    इसलिए विवाद केवल जमीन और सीमा का नहीं था। यह लोगों की राष्ट्रीय पहचान से भी जुड़ा था कि वे खुद को ब्रिटिश मानते हैं या आयरिश।

    राष्ट्रवादी: ज्यादातर कैथोलिक, आयरलैंड के साथ एकीकरण के समर्थक।

    संघवादी: ज्यादातर प्रोटेस्टेंट, ब्रिटेन के साथ बने रहने के पक्षधर।

    ‘द ट्रबल्स’ में तीन दशक तक चली हिंसा

    1960 के दशक के अंत तक दोनों पक्षों के बीच तनाव हिंसक संघर्ष में बदल गया। इस दौर को ‘द ट्रबल्स’ के नाम से जाना जाता है। करीब तीन दशक तक उत्तरी आयरलैंड में बम धमाकों, गोलीबारी और दूसरे हिंसक हमलों का सिलसिला चलता रहा।

    इस संघर्ष में दोनों पक्षों के अर्धसैनिक संगठन सक्रिय रहे और ब्रिटिश सैनिक भी बड़ी संख्या में तैनात किए गए। हिंसा का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा। इस दौरान करीब 3,600 लोगों की मौत हुई।

    इसी लंबे हिंसक इतिहास के कारण उत्तरी आयरलैंड के संवैधानिक भविष्य पर होने वाली कोई भी राजनीतिक चर्चा बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

    1998 में गुड फ्राइडे समझौते ने खोला रास्ता

    1998 में गुड फ्राइडे समझौते के बाद हिंसा काफी हद तक समाप्त हुई। इस शांति समझौते में अमेरिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि समझौते ने उत्तरी आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति को हमेशा के लिए तय नहीं किया।

    समझौते में यह प्रावधान रखा गया कि अगर परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि यह संकेत मिले कि उत्तरी आयरलैंड के लोग आयरलैंड के साथ एकीकरण के पक्ष में मतदान कर सकते हैं, तो जनमत संग्रह कराया जा सकता है।

    ब्रिटेन सरकार का मौजूदा रुख है कि फिलहाल ऐसी परिस्थितियां नहीं बनी हैं। उसके मुताबिक सार्वजनिक राय उस स्तर तक नहीं बदली है, जिससे एकीकरण पर जनमत संग्रह कराने की जरूरत पैदा हो।

    अगर भविष्य में उत्तरी आयरलैंड में एकीकरण के पक्ष में जनमत संग्रह होता है, तो आयरलैंड में भी इस बदलाव को मंजूरी देने के लिए जनमत संग्रह कराना होगा।

    ट्रंप के बयान पर ब्रिटेन और आयरलैंड की प्रतिक्रिया

    ट्रंप के बयान पर आयरलैंड में एकीकरण के समर्थकों ने स्वागत किया, जबकि ब्रिटेन में इसे लेकर सावधानी बरती गई। आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन ने लोगों से मामले पर शांत नजरिया रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह खुद आयरिश एकता में विश्वास रखते हैं और आयरलैंड की कई राजनीतिक पार्टियां भी इसका समर्थन करती हैं।

    ब्रिटेन सरकार ने भी ट्रंप के बयान को ज्यादा तूल देने से बचने की कोशिश की। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के कार्यालय ने गुड फ्राइडे समझौते के प्रति पूर्ण समर्थन दोहराया। साथ ही कहा कि जनमत संग्रह तभी विचाराधीन होगा, जब लोगों की राय में इतना महत्वपूर्ण बदलाव आए कि इस मुद्दे पर विचार करना जरूरी हो।

    ब्रिटेन की विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बेडेनोच ने ट्रंप की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ट्रंप इससे पहले ग्रीनलैंड और कनाडा के अमेरिका का 51वां राज्य बनने जैसे मुद्दों पर भी इसी तरह बयान दे चुके हैं और लोकतांत्रिक देशों के भविष्य को लेकर ऐसी टिप्पणियां तनाव पैदा कर सकती हैं।

    उत्तरी आयरलैंड की डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के नेता गेविन रॉबिन्सन ने भी ट्रंप के बयान को खारिज किया। उनका कहना था कि उत्तरी आयरलैंड का संवैधानिक भविष्य वहां के लोग तय करेंगे, न कि लंदन, डबलिन या वाशिंगटन में होने वाली टिप्पणियां।

    सिन फेन ने किया ट्रंप के बयान का स्वागत

    आयरलैंड के एकीकरण की मांग करने वाली सिन फेन पार्टी ने ट्रंप की टिप्पणी का स्वागत किया। पार्टी का कहना है कि उत्तरी आयरलैंड का भविष्य आयरलैंड के साथ होना चाहिए।

    सिन फेन के पूर्व नेता गेरी एडम्स ने भी ट्रंप के बयान को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि कई दूसरे मुद्दों पर ट्रंप से गहरे मतभेद होने के बावजूद आयरिश एकता को लेकर उनकी टिप्पणी स्वागत योग्य है।

    आयरलैंड की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां सिद्धांत रूप में एकीकरण का समर्थन करती हैं। हालांकि सिन फेन का आरोप है कि माइकल मार्टिन की मध्यमार्गी सरकार संभावित एकीकरण की स्थिति को देखते हुए पर्याप्त तैयारी नहीं कर रही है।

    मार्टिन का कहना है कि वह आयरिश एकता में विश्वास रखते हैं, लेकिन इस दिशा में गुड फ्राइडे समझौते में तय प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप पहले भी आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड के संभावित ‘विलय’ को लेकर सवाल कर चुके हैं।

    आखिर ट्रंप का बयान इतना संवेदनशील क्यों?

    उत्तरी आयरलैंड का भविष्य ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों में से एक है। कई दशक की हिंसा के बाद बनी शांति और गुड फ्राइडे समझौते ने दोनों समुदायों के बीच एक नाजुक संतुलन कायम किया है।

    अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने आम तौर पर इस मुद्दे पर सीधे राजनीतिक रुख जाहिर करने से परहेज किया है। आयरलैंड से गहरे भावनात्मक संबंध रखने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी उत्तरी आयरलैंड के एकीकरण के सवाल पर सीधे तौर पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया था।

    ऐसे में ट्रंप का सार्वजनिक रूप से एकीकृत आयरलैंड के समर्थन में बोलना इस पुराने और संवेदनशील विवाद को फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ले आया है। हालांकि मौजूदा व्यवस्था में किसी भी बदलाव का फैसला ट्रंप के बयान से नहीं, बल्कि गुड फ्राइडे समझौते में तय संवैधानिक और जनमत संग्रह की प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है।

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