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शाहरुख खान की फिल्मों की फैन रहीं राधिका आप्टे ने कहा, पुराने सिनेमा में ‘न’ को भी नजरअंदाज किया जाता था

September 18, 2026

नई दिल्ली । राधिका आप्टे (Radhika Apte) ने बॉलीवुड की पुरानी रोमांटिक (Romantic) फिल्मों में प्रेम और इच्छा को पेश करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। एक बातचीत के दौरान अभिनेत्री ने कहा कि उनके दौर से पहले बनी कई फिल्मों में महिलाओं (Women) का पीछा करने (Chasing Women) और उनकी असहमति (Disagreement) को नजरअंदाज करने जैसी चीजों को रोमांस के तौर पर प्रस्तुत (Presented) किया जाता था। उन्होंने माना कि समय के साथ हिंदी सिनेमा में बदलाव आया है, लेकिन इस क्षेत्र में अभी भी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है।

राधिका ने पुरानी फिल्मों को दोबारा देखने के अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि किशोरावस्था में जिन चीजों को रोमांटिक कल्पना का हिस्सा माना जाता था, उन्हें अब अलग नजरिए से देखने पर वह परेशान करने वाली लगती हैं। उन्होंने विशेष रूप से ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख किया, जिनमें महिला की ओर से मना किए जाने के बावजूद पुरुष पात्र उसका पीछा करता रहता है और कहानी इसे प्रेम या आकर्षण के रूप में पेश करती है।

अभिनेत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि वह शाहरुख खान की बड़ी प्रशंसक रही हैं। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि उनकी पसंद की कुछ पुरानी फिल्मों को दोबारा देखने पर उन्हें यह महसूस हुआ कि कई दृश्यों में महिला की असहमति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनके अनुसार, उस समय फिल्मों में महिलाओं का पीछा करने को रोमांस के तौर पर स्वीकार करने वाली प्रस्तुति आम थी।

राधिका का कहना था कि सिनेमा में महिलाओं को देखने का नजरिया भी लंबे समय तक पुरुष-केंद्रित रहा। उन्होंने महिलाओं के सेक्सुलाइजेशन पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ उन्हें जरूरत से ज्यादा यौन रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि दूसरी तरफ उन्हें आदर्श और नैतिकता के ऊंचे मानकों पर रखने की कोशिश की गई। उनके मुताबिक, दोनों तरह की प्रस्तुतियों के बीच मौजूद विरोधाभास को समझना जरूरी है।

इस चर्चा में निर्देशक शकुन बत्रा ने भी पुराने हिंदी सिनेमा का संदर्भ दिया। उन्होंने राज कपूर की फिल्मों का उदाहरण देते हुए कहा कि शाहरुख खान के बॉलीवुड में आने से काफी पहले भी सिनेमा में इच्छा और आकर्षण को दिखाने के प्रयास किए जाते थे। उन्होंने ‘राम तेरी गंगा मैली’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्मों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया।

राधिका ने हालांकि इस दृष्टिकोण से जुड़े एक दूसरे पहलू पर जोर दिया। उनका कहना था कि उस दौर की फिल्मों में इच्छा दिखाने के दौरान भी नजर अक्सर पुरुष की होती थी और महिलाओं को उसी नजरिए से प्रस्तुत किया जाता था। उन्होंने कहा कि केवल किसी दृश्य में इच्छा या आकर्षण दिखाने को प्रगतिशील मान लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि महिला पात्र को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।

राधिका ने कहा कि फिल्मों का प्रभाव समाज की सोच पर पड़ता है और कई बार सिनेमा में दिखाई गई चीजें लोगों की प्रेम और आकर्षण की समझ का हिस्सा बन जाती हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की ओर से ध्यान न देना या गलत व्यवहार करना ही आकर्षण की निशानी समझी जाने लगे, तो ऐसी धारणा को बदलने में लंबा समय लग सकता है।


  • शकुन बत्रा ने यह भी कहा कि आज की फिल्मों को लेकर भविष्य में आने वाली पीढ़ियां अलग सवाल उठा सकती हैं। उनके अनुसार, जिस तरह आज पुरानी फिल्मों को नए सामाजिक नजरिए से देखा जा रहा है, उसी तरह आने वाले वर्षों में मौजूदा फिल्मों की प्रस्तुति और कहानियों की भी समीक्षा हो सकती है। बातचीत में दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी सिनेमा ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन महिलाओं, पुरुषों और पूरे समाज की बदलती समझ के अनुरूप कहानी कहने में अभी भी लगातार बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है।

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