
नई दिल्ली। राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक चीफ जस्टिस और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा (Justice Sanjeev Prakash Sharma) ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) की ओर से लगाए गए आरोपों पर जवाब दिया है। शर्मा ने आरोपों (Allegations) को खारिज करते हुए कहा कि उनके पीछे ‘साधारण पेशेवर ईर्ष्या’ हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस मेहता को हाईकोर्ट के कामकाज में दखल देने का अधिकार नहीं था। शर्मा ने प्रभावशाली मुकदमेदारों को फायदा पहुंचाने, रोस्टर में हेरफेर (Roster Manipulation), जांच में दखल देने और किसी खास पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए न्यायिक अधिकारियों के तबादले के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि काम करने के तरीके में अंतर होने का मतलब यह नहीं है कि कोई गलत है। पिछले सप्ताह राजस्थान हाईकोर्ट के जज पद से रिटायर हुए शर्मा ने कहा कि उन्हें जस्टिस मेहता से जिरह (Cross-Examination) करने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि राजस्थान में वकीलों को उनके खिलाफ प्रदर्शन के लिए उकसाया गया।
अगस्त में जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को कई पत्र भेजे थे और उनकी प्रतियां सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को भी दी थीं। इन पत्रों में उन्होंने जस्टिस शर्मा पर शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। उनका दावा था कि उन्हें जस्टिस शर्मा के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, जिनसे उनकी ईमानदारी को लेकर सवाल उठते हैं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर उन्होंने कार्यवाहक चीफ जस्टिस को दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने और राजस्थान हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति की मांग की थी।
इसी महीने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज संजय के. अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की। यह सिफारिश उस समय हुई जब वकीलों के विरोध के बीच जस्टिस शर्मा छुट्टी पर चले गए थे। शर्मा ने कहा कि यदि शिकायत थी तो वह सबसे पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास क्यों नहीं गई। उन्होंने बताया कि उन्होंने जस्टिस मेहता के चार पत्रों के जवाब दिए और खुद सीजेआई को पत्र लिखकर पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज हाईकोर्ट के कामकाज में दखल दे सकता है।
जस्टिस शर्मा ने अपने कार्यकाल का बचाव करते हुए कहा कि करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में उन्होंने 88 हजार से अधिक मामलों का फैसला किया है। उनके मुताबिक, जिन फैसलों की सुप्रीम कोर्ट में जांच हुई, उनमें से कई को बरकरार रखा गया। उन्होंने कहा कि जजों को अपनी हद पता होनी चाहिए और उन्हें मालूम होना चाहिए कि कहां बोलना है और कहां नहीं। उनके अनुसार, जज अपने फैसलों के जरिए बोलते हैं और उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जजों को सोशल मीडिया पर नहीं परखा जाना चाहिए और आम लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा प्रभावित नहीं होना चाहिए।
आरोपों की वजह पूछे जाने पर शर्मा ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन पेशेवर जलन इसकी वजह हो सकती है। उन्होंने बताया कि 2011 में दोनों को सीनियर एडवोकेट बनाया गया था। शर्मा के अनुसार, उन्होंने आवेदन नहीं किया था और फुल कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट बनाया, जबकि जस्टिस मेहता ने आवेदन किया था। शर्मा ने कहा कि वह पहली पीढ़ी के वकील हैं, जबकि जस्टिस मेहता न्यायिक परिवार से आते हैं और पदोन्नति के समय जस्टिस मेहता ने यह सुनिश्चित किया कि वह चीफ जस्टिस न बनें।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया। वकालत के दौरान जस्टिस मेहता जोधपुर और वह जयपुर में थे, जबकि जज बनने के बाद भी दोनों अलग-अलग जगहों पर रहे। उनके मुताबिक, जस्टिस मेहता मुख्य रूप से आपराधिक मामलों से जुड़े थे और वह संवैधानिक मामलों के वकील रहे हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस मेहता चार साल से राजस्थान से बाहर हैं, इसलिए उन्हें राजस्थान की समस्याओं के बारे में कैसे पता होगा।
बूंदी के एक मुकदमेदार से मुलाकात के आरोप पर शर्मा ने बताया कि उनकी पत्नी भी अत्री समुदाय से हैं और रघुबीर सिंह अत्री उनके साले नहीं बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में हैं। अत्री छुट्टियों में आए थे और वह उन्हें मंदिर ले गए थे। उन्होंने कहा कि बाद में इस मुलाकात को मुकदमे को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में पेश किया गया। शर्मा के मुताबिक, अत्री का मुकदमा 1992 से चल रहा है और उनके भाई की ओर से दायर मुकदमे को खारिज कराने का आवेदन अत्री ने दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर वह मामले को प्रभावित कर रहे होते तो आवेदन मंजूर करा सकते थे।
शर्मा ने जस्टिस मेहता के उस दावे को भी खारिज किया कि अत्री के मामले में अनुकूल फैसला नहीं देने वाले न्यायिक अधिकारियों का तबादला किया गया। उन्होंने इसे ‘बिल्कुल बेतुका’ बताते हुए कहा कि करीब 800 तबादले किए गए थे। उनके अनुसार, आम तौर पर तबादले रजिस्ट्रार जनरल करते हैं और इसमें संबंधित अधिकारी के किसी स्थान पर बिताए समय समेत कई बातों को देखा जाता है।
रोस्टर में हेरफेर के आरोप पर उन्होंने कहा कि चीफ जस्टिस के पास मामलों को स्थानांतरित करने का अधिकार होता है और इसके लिए वकीलों की समस्याओं तथा सरकार की ओर से मामलों के लंबित रहने जैसी कई जानकारियां मिलती हैं। उदयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी के बहुकरोड़ रुपये के मामले पर शर्मा ने कहा कि तीन जजों के खुद को अलग करने के बाद उन्होंने इसे लिया था और एडवोकेट जनरल ने उनसे अपील की सुनवाई करने का अनुरोध किया था। वकीलों के आंदोलन पर उन्होंने कहा कि मांगों का आधार न होने पर जजों को उन्हें खुश करने की जरूरत नहीं है।
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