वाशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय बाजार (International market) में कच्चे तेल (Crude oil) की कीमतों में तेजी और सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं के बीच अमेरिका ने तेल बाजार (US oil market) को राहत देने की तैयारी शुरू कर दी है। अमेरिकी सरकार अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। इसका उद्देश्य बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाने की कोशिश करना है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में शनिवार को वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड 3.51 प्रतिशत चढ़कर 101.40 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 3.72 प्रतिशत बढ़कर करीब 110 डॉलर प्रति बैरल हो गई। कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
ईरान युद्ध और होर्मुज में बाधाओं से बढ़ी चिंता
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह वैश्विक स्तर पर सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता है। ईरान के साथ अमेरिका के युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर हमलों से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई बाधाओं ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है। यहां से तेल की आवाजाही बाधित होने पर कई देशों तक कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। बाजार में जब भविष्य में तेल की कमी की आशंका बढ़ती है, तो कारोबारी कीमतों में तेजी की संभावना को ध्यान में रखकर खरीदारी करते हैं।
इसी दबाव को कम करने के लिए अमेरिकी सरकार अपने आपात भंडार से अतिरिक्त तेल बाजार में लाने की तैयारी कर रही है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने शुक्रवार को तेल की अदला-बदली से जुड़ी नई योजना के लिए कंपनियों से प्रस्ताव मांगे। इसके तहत कंपनियां सरकार के रणनीतिक भंडार से फिलहाल तेल ले सकेंगी और बाद में निर्धारित शर्तों के अनुसार उसे वापस करेंगी।
अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (एसपीआर) आपात परिस्थितियों में इस्तेमाल के लिए बनाया गया है। युद्ध, तेल की आपूर्ति में बड़ी रुकावट या ऊर्जा संकट के दौरान सरकार इस भंडार का उपयोग बाजार को राहत देने के लिए कर सकती है।
इस बार करीब 17 मिलियन बैरल यानी 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की तैयारी है। अदला-बदली की व्यवस्था के तहत कंपनियों को तत्काल तेल मिलेगा, जबकि उसकी वापसी बाद में तय शर्तों के अनुसार करनी होगी।
इस कदम से बाजार में तत्काल उपलब्धता बढ़ सकती है। कंपनियों को अतिरिक्त तेल मिलने पर उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खुले बाजार से कम खरीदारी करनी पड़ सकती है। इससे कीमतों पर दबाव घटने की संभावना है। हालांकि, अगर युद्ध और समुद्री मार्गों में बाधाएं जारी रहती हैं, तो केवल भंडार से तेल जारी करने से कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं है।
मार्च में 17.2 करोड़ बैरल तेल देने का हुआ था वादा
अमेरिका की मौजूदा पहल मार्च में किए गए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वादे से भी जुड़ी है। उस समय अमेरिका ने अपने रणनीतिक भंडार से 17.2 करोड़ बैरल तेल उपलब्ध कराने का वादा किया था। यह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के करीब 30 सदस्य देशों की साझा योजना का हिस्सा था।
इस पहल के तहत दुनियाभर के आपातकालीन भंडार से कुल 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का लक्ष्य रखा गया था। इसका मकसद सप्लाई में आई बाधाओं के प्रभाव को कम करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार को स्थिरता देना था।
हालांकि, इस योजना को लागू करने में चुनौतियां भी सामने आईं। इससे पहले अमेरिका की ओर से की गई एक पेशकश पर कंपनियों की प्रतिक्रिया काफी सीमित रही थी।
कंपनियों ने क्यों नहीं दिखाई ज्यादा दिलचस्पी?
रिपोर्ट के मुताबिक, जून में कंपनियों ने केवल करीब पांच लाख बैरल तेल उधार लेने में दिलचस्पी दिखाई थी। इसकी एक वजह योजना की शर्तें थीं। कंपनियों को उधार लिए गए तेल के बदले बाद में 24 प्रतिशत तक अतिरिक्त कच्चा तेल लौटाना पड़ सकता था।
इसका अर्थ है कि कंपनियों को भविष्य में प्राप्त मात्रा से अधिक तेल वापस करना पड़ सकता था। ऐसी शर्तों के कारण उनके लिए यह व्यवस्था कम आकर्षक साबित हुई।
अब अमेरिकी सरकार की नई पेशकश पर नजर रहेगी। यदि कंपनियां इस बार ज्यादा मात्रा में तेल लेने के लिए आगे आती हैं, तो बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाने के प्रयास को गति मिल सकती है।
रूसी डीजल की सप्लाई बढ़ाने की भी कोशिश
तेल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अमेरिका की कोशिशें केवल रणनीतिक भंडार तक सीमित नहीं हैं। इस महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच रूसी डीजल के निर्यात की अनुमति को लेकर भी सहमति बनने की बात सामने आई है। इसके तहत शुरुआती चरण में करीब तीन लाख टन डीजल जारी होने की उम्मीद है।
डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति से उन बाजारों को राहत मिल सकती है, जहां इसकी उपलब्धता को लेकर दबाव है। हालांकि, इस कदम पर राजनीतिक विवाद भी है। यूक्रेन और यूरोपीय नेताओं ने रूस को राहत देने की आलोचना की है। उनका तर्क है कि रूसी तेल उत्पादों के निर्यात में ढील से मॉस्को को आर्थिक फायदा हो सकता है।
इससे स्पष्ट है कि वैश्विक तेल बाजार को संभालने के प्रयासों में आर्थिक जरूरतों के साथ युद्ध, प्रतिबंध और देशों के राजनीतिक हित भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
जी7 भी बाजार में उतारेगा करीब 10 करोड़ बैरल तेल
दुनिया के सात प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह जी7 ने भी 2 अक्टूबर को आपात तेल जारी करने की अलग योजना घोषित की थी। इसके तहत चार महीनों में करीब 10 करोड़ बैरल तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कराने की योजना है। इस पहल को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना है।
इस योजना में डीजल की आपूर्ति बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि बाजार में उसकी कमी को दूर करने में मदद मिल सके।
अमेरिका और जी7 की कोशिशों का साझा उद्देश्य बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना और मांग तथा आपूर्ति के बीच अंतर को कम करना है। हालांकि, आपात भंडार से तेल जारी करना संकट के दौरान राहत देने का उपाय है, स्थायी समाधान नहीं। यदि सामान्य आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो भंडार से तेल निकालकर कीमतों को लगातार नीचे रखना मुश्किल हो सकता है।
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या होगा असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का सीधा महत्व भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ता है और तेल कंपनियों की लागत पर दबाव पड़ सकता है।
यदि अमेरिका और दूसरे देशों की पहल से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ती है और कीमतों में गिरावट आती है, तो भारत को भी राहत मिल सकती है। इससे कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी। घरेलू ईंधन की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव के अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर, तेल कंपनियों की लागत तथा केंद्र और राज्य सरकारों के करों का भी असर पड़ता है।
इसलिए भारतीय उपभोक्ताओं को कितनी राहत मिलेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में कितनी गिरावट आती है और वह कितने समय तक बनी रहती है। यदि आपूर्ति को लेकर चिंताएं बरकरार रहती हैं और कच्चा तेल 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर बना रहता है, तो कीमतों में राहत सीमित रह सकती है।
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