नई दिल्ली। क्या आने वाले समय में चांद (Moon)आसमान से गायब हो जाएगा? क्या उसका आकार लगातार छोटा होता जा रहा है? चंद्रमा को लेकर सामने आई एक नई वैज्ञानिक स्टडी (New scientific study)ने इन सवालों पर चर्चा तेज कर दी है। प्लेनेटरी साइंस जर्नल (Planetary Science Journal)में 14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित शोध के मुताबिक चंद्रमा धीरे धीरे सिकुड़ रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले लगभग 400 वर्षों में चंद्रमा के आकार में करीब 148 फीट की कमी आई है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि चांद जल्द ही गायब हो जाएगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रमा का सिकुड़ना एक प्राकृतिक भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो बेहद धीमी गति से जारी है। इस शोध में चंद्रमा की सतह पर होने वाले बदलावों और वहां आने वाले भूकंपों को समझने की कोशिश की गई है।
इस अध्ययन का नेतृत्व स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम के सेंटर फॉर अर्थ एंड प्लेनेटरी स्टडीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक थॉमस आर वाटर्स ने किया। शोधकर्ताओं ने नासा के लूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर कैमरा से प्राप्त तस्वीरों और आंकड़ों का विश्लेषण किया। करीब 17 वर्षों के दौरान जुटाई गई लाखों तस्वीरों की मदद से वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह पर होने वाले बदलावों का अध्ययन किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से के ठंडा होने के कारण उसकी बाहरी परत किस तरह प्रभावित हो रही है। अध्ययन के अनुसार चंद्रमा का आंतरिक हिस्सा धीरे धीरे ठंडा हो रहा है जिससे उसकी संरचना में बदलाव आ रहा है और उसका आकार सिकुड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रमा के सिकुड़ने की गति बेहद कम है। अनुमान है कि यह हर दस लाख वर्षों में लगभग 6 से 11 सेंटीमीटर तक सिकुड़ सकता है। इतनी धीमी गति के कारण सामान्य परिस्थितियों में इसके आकार में होने वाले बदलाव को देख पाना संभव नहीं है। चंद्रमा का सिकुड़ना किसी अचानक होने वाली घटना का संकेत नहीं है बल्कि लंबे समय से चल रही प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए इस शोध के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि चंद्रमा निकट भविष्य में पूरी तरह गायब हो जाएगा। वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इस बात में अधिक है कि इस प्रक्रिया से उसकी सतह और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
चंद्रमा के सिकुड़ने का एक महत्वपूर्ण परिणाम उसकी सतह पर दरारों और छोटी पहाड़ियों जैसी संरचनाओं का बनना है। वैज्ञानिक इन्हें लोबेट स्कार्प्स कहते हैं। जब चंद्रमा की बाहरी परत सिकुड़ती है तो उसमें दबाव पैदा होता है। इस दबाव के कारण चट्टानों की परतें एक दूसरे के ऊपर खिसक सकती हैं और सतह पर ऊंचे ढाल जैसी आकृतियां बन सकती हैं। शोध में चंद्रमा की सतह पर मौजूद ऐसी संरचनाओं और दरारों का अध्ययन किया गया है। इन बदलावों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि चंद्रमा पर आने वाले भूकंप अंतरिक्ष यात्रियों और भविष्य में बनाए जाने वाले ठिकानों के लिए चुनौती बन सकते हैं।
धरती पर अधिकांश भूकंपीय गतिविधियां टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाओं के आसपास होती हैं लेकिन चंद्रमा की संरचना इससे अलग है। चंद्रमा को एक ऐसी खगोलीय पिंड के रूप में देखा जाता है जिसकी बाहरी परत में प्लेटों जैसी सक्रिय व्यवस्था धरती की तरह नहीं है। इसके बावजूद वहां की सतह पर तनाव और दरारों के कारण अलग अलग क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधियां हो सकती हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक चंद्रमा की सतह की संरचना को समझने पर जोर दे रहे हैं। भविष्य में जब नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियां चंद्रमा पर मानव मिशन भेजेंगी तो लैंडिंग स्थल और संभावित ठिकानों का चयन करते समय इन जोखिमों को ध्यान में रखना होगा।
कुल मिलाकर चंद्रमा का सिकुड़ना वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है लेकिन इससे उसके जल्द गायब होने का खतरा नहीं है। नई स्टडी चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से में होने वाले बदलावों और उसकी सतह पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में मदद करती है। वैज्ञानिकों के लिए असली चुनौती यह जानना है कि ये बदलाव भविष्य के चंद्र अभियानों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं। इस शोध से स्पष्ट होता है कि चंद्रमा आज भी भूवैज्ञानिक रूप से बदलावों से गुजर रहा है और उसकी सतह को समझना अंतरिक्ष विज्ञान के लिए लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।