
नई दिल्ली । उत्तराखंड (Uttarakhand)के चमोली जिले (Chamoli district)में हिमालय (Himalaya)की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)देश के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में शामिल है। भगवान विष्णु को (Lord Vishnu)समर्पित यह मंदिर चार धाम यात्रा का प्रमुख पड़ाव है। अलकनंदा नदी के किनारे बसे इस दिव्य धाम में हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं। इसी वजह से बद्रीनाथ धाम को भू-वैकुंठ यानी धरती पर भगवान विष्णु का धाम कहा जाता है। लेकिन इस मंदिर की खासियत केवल इसकी आस्था और पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है। यहां की एक ऐसी परंपरा भी है जिसके तहत सर्दियों में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी भगवान की पूजा लगातार जारी रहती है।
क्यों कहा जाता है बद्रीनाथ को भू-वैकुंठ?
हिंदू धर्म में वैकुंठ को भगवान विष्णु का दिव्य निवास माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु की विशेष कृपा रहती है और यहां दर्शन करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है। इसी धार्मिक विश्वास के कारण इस तीर्थ को भू-वैकुंठ की संज्ञा दी गई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने बद्रीनाथ क्षेत्र में नर-नारायण के रूप में कठोर तपस्या की थी। मान्यता है कि तपस्या के दौरान माता लक्ष्मी ने उन्हें कठिन मौसम से बचाने के लिए बदरी यानी बेर के वृक्ष का रूप धारण किया था। इसी कथा को बद्रीनाथ नाम की उत्पत्ति से जोड़कर देखा जाता है। हिमालय की गोद में स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण के कारण भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
सर्दियों में क्यों बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट?
बद्रीनाथ धाम समुद्र तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है और तापमान काफी नीचे चला जाता है। ऐसे मौसम में मंदिर तक पहुंचना और श्रद्धालुओं के लिए यात्रा करना कठिन हो जाता है। इसी कारण हर साल शीतकाल में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
आमतौर पर बद्रीनाथ मंदिर के कपाट अप्रैल या मई में खुलते हैं और अक्टूबर या नवंबर में बंद होते हैं। हालांकि कपाट खुलने और बंद होने की तारीख धार्मिक पंचांग तथा परंपराओं के अनुसार निर्धारित की जाती है। कपाट बंद होने से पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद शीतकालीन पूजा की परंपराएं शुरू होती हैं।
छह महीने कहां होती है भगवान बद्री विशाल की पूजा?
बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने का अर्थ यह नहीं है कि भगवान की पूजा भी बंद हो जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार शीतकाल में भगवान बद्री विशाल की पूजा के लिए उनकी उत्सव मूर्ति को पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर ले जाया जाता है। वहीं जोशीमठ के नरसिंह मंदिर का भी बद्रीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा व्यवस्था में विशेष महत्व है।
जोशीमठ को ज्योतिर्मठ के नाम से भी जाना जाता है। सर्दियों में बद्रीनाथ के कपाट बंद रहने के दौरान यहां भगवान की पूजा से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं। इस व्यवस्था के जरिए हिमालय में मौसम की कठिन परिस्थितियों के बावजूद धार्मिक अनुष्ठान जारी रहते हैं। यही परंपरा बद्रीनाथ धाम की आस्था और सांस्कृतिक विरासत को खास बनाती है।
कौन करते हैं बद्रीनाथ मंदिर में पूजा?
बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है। परंपरागत रूप से रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय से होते हैं। मंदिर में वैदिक विधि-विधान के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की मूर्ति को पुनः स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
बद्रीनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु आसपास के कई धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों के दर्शन भी करते हैं। इनमें माणा गांव व्यास गुफा भीम पुल और सरस्वती नदी का क्षेत्र प्रमुख हैं। इस तरह बद्रीनाथ धाम केवल दर्शन का स्थान नहीं बल्कि पौराणिक मान्यताओं प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन परंपराओं का अनूठा संगम है।
भू-वैकुंठ के रूप में प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां मौसम के कारण मंदिर के कपाट भले ही कुछ महीनों के लिए बंद हो जाएं लेकिन भगवान के प्रति श्रद्धा और पूजा की परंपरा निरंतर बनी रहती है।
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