
नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) में रामायण (Ramayana) की कहानी को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करने का इतिहास आज का नहीं है। आधुनिक तकनीक, भव्य सेट और बड़े सितारों वाली फिल्मों से करीब एक सदी पहले भी रामकथा को सिनेमा के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा चुका था। साल 1916 में बनी मूक फिल्म (Silent Film) ‘लंका दहन’ (Lanka Dahan) को भारतीय सिनेमा की पहली रामायण फिल्म माना जाता है। इस फिल्म के निर्माण (Production) से जुड़ी कई बातें आज भी सिनेमा के इतिहास (History Of Cinema) में खास स्थान रखती हैं।
‘लंका दहन’ का निर्देशन भारतीय सिनेमा के शुरुआती निर्माता और फिल्मकार दादासाहेब फाल्के ने किया था। यह फिल्म उस दौर में बनाई गई थी, जब भारतीय फिल्मों में आवाज और संवाद की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। मूक फिल्मों के समय कलाकारों को अपने हावभाव, चेहरे के भाव और शारीरिक गतिविधियों के जरिए कहानी दर्शकों तक पहुंचानी पड़ती थी। ऐसे में धार्मिक और पौराणिक कथाओं को पर्दे पर दिखाना फिल्मकारों के लिए एक बड़ी रचनात्मक चुनौती थी।
फिल्म की कहानी रामायण के प्रसिद्ध प्रसंगों पर आधारित थी। इसमें भगवान राम और माता सीता से जुड़े किरदारों के साथ लंका दहन की कथा को पर्दे पर प्रस्तुत किया गया था। उस समय फिल्मों में आज की तरह संवाद सुनाई नहीं देते थे। इसलिए दर्शकों को कहानी समझाने के लिए दृश्यों और कलाकारों की भाव-भंगिमाओं का सहारा लिया जाता था। ‘लंका दहन’ ने पौराणिक कथा को सिनेमा के माध्यम से प्रस्तुत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस फिल्म के निर्माण से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात इसके कलाकार अण्णा सालुंके थे। उन्होंने एक ही फिल्म में भगवान राम और माता सीता, दोनों की भूमिका निभाई थी। आज के समय में जहां अलग-अलग किरदारों के लिए कलाकारों का चयन किया जाता है, वहीं उस दौर में महिला भूमिकाओं के लिए भी पुरुष कलाकारों को लिया जाता था।
दरअसल, 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में महिलाओं का फिल्मों में काम करना सामाजिक रूप से सहज स्वीकार नहीं किया जाता था। इस कारण फिल्म निर्माताओं को महिला किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकार मिलने में कठिनाई होती थी। कई शुरुआती भारतीय फिल्मों में पुरुष कलाकार ही महिलाओं की भूमिकाएं निभाते थे। ‘लंका दहन’ में अण्णा सालुंके द्वारा राम और सीता दोनों का किरदार निभाना इसी दौर की फिल्म निर्माण परिस्थितियों को दर्शाता है।
फिल्म का बजट भी उस समय के लिहाज से चर्चा का विषय था। ‘लंका दहन’ को लगभग 15 हजार रुपये की लागत से तैयार किया गया था। आज के फिल्म उद्योग में जहां किसी बड़ी फिल्म के निर्माण पर करोड़ों और कभी-कभी हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, वहीं उस दौर में सीमित संसाधनों के बीच इतनी बड़ी पौराणिक कहानी को पर्दे पर उतारना अपने आप में महत्वपूर्ण था।
कमाई के मामले में भी इस फिल्म ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। मुंबई के नाज टॉकीज में फिल्म ने पहले सप्ताह में लगभग 30 हजार रुपये की कमाई की थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, शुरुआती 10 दिनों में इसका कलेक्शन करीब 32 हजार से 35 हजार रुपये के बीच पहुंच गया था। इस प्रदर्शन के कारण ‘लंका दहन’ को भारतीय सिनेमा की शुरुआती बड़ी बॉक्स ऑफिस सफलताओं में गिना जाता है। इसे भारतीय सिनेमा की पहली बॉक्स ऑफिस हिट फिल्मों में से एक माना जाता है।
आज रामायण पर आधारित फिल्मों में आधुनिक तकनीक, विशेष प्रभाव और बड़े बजट का इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ही में रणबीर कपूर की रामायण भी सिनेमाघरों में पहुंची है, जिसमें रणबीर भगवान राम और यश रावण की भूमिका में नजर आ रहे हैं। फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच काफी चर्चा है और इसे 2026 की बड़ी ओपनिंग हासिल करने वाली फिल्मों में बताया जा रहा है।
हालांकि, भारतीय सिनेमा में रामायण को पर्दे पर उतारने की परंपरा की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। 1916 की ‘लंका दहन’ इस बात का उदाहरण है कि सीमित तकनीक और संसाधनों के बावजूद फिल्मकारों ने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक कथाओं को सिनेमा का हिस्सा बनाने का प्रयास किया। लगभग 15 हजार रुपये के बजट और एक ही कलाकार द्वारा राम-सीता की दोहरी भूमिका निभाने वाली यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
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