
नई दिल्ली । हिंदू धर्म (Hinduism) में धनतेरस (Dhanteras) का पर्व केवल धन और समृद्धि की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और अकाल मृत्यु से बचाव की धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है। कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर मां लक्ष्मी (Goddess Lakshmi), भगवान कुबेर (Lord Kubera) और भगवान धन्वंतरि (Lord Dhanvantari) की पूजा की जाती है। इसके साथ ही शाम के समय यमराज (Yama) के नाम से घर के बाहर दीपक जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है। इसे यम दीपदान या यम दीपक कहा जाता है।
धनतेरस को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन लोग सोने-चांदी के आभूषण, नए बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शुभ वस्तुओं को घर लाने और विधि-विधान से पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, इस त्योहार का महत्व समझने के लिए इससे जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं को जानना जरूरी है।
धनतेरस की पहली प्रमुख कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद, चिकित्सा और आरोग्य का देवता माना जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार भी कहा जाता है।
उनके हाथों में अमृत कलश होने के कारण धनतेरस पर नए बर्तन और धातुओं की खरीदारी की परंपरा प्रचलित हुई। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में बरकत लाती हैं और परिवार के सदस्यों को अच्छे स्वास्थ्य तथा लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है।
एक अन्य कथा मां लक्ष्मी से संबंधित है। कहा जाता है कि एक बार श्राप के कारण माता लक्ष्मी को 12 वर्षों तक एक किसान के घर रहना पड़ा। उनके वहां रहने के दौरान किसान की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और उसके घर में धन-धान्य की कमी नहीं रही। बारह वर्ष पूरे होने पर जब माता लक्ष्मी वापस जाने लगीं तो किसान ने उनसे रुकने का आग्रह किया।
तब माता लक्ष्मी ने उसे कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को घर की सफाई करने, घी का दीपक जलाने और सिक्कों से भरे कलश की पूजा करने का उपाय बताया। किसान ने श्रद्धापूर्वक ऐसा ही किया। मान्यता है कि इसके बाद उसके घर में सुख-समृद्धि बनी रही। इसी कथा को धनतेरस पर लक्ष्मी पूजा और दीप प्रज्वलित करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।
धनतेरस पर यम दीपक जलाने के पीछे राजा हेमा के पुत्र की कथा विशेष रूप से प्रचलित है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि मनुष्य के प्राण लेते समय क्या कभी उन्हें दुख या दया का अनुभव हुआ है। इस पर एक दूत ने नवविवाहिता के दुख का प्रसंग सुनाया।
कथा के अनुसार, राजा हेमा के घर पुत्र का जन्म हुआ था। ज्योतिषियों ने उसकी कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। इस आशंका से राजा ने अपने पुत्र को यमुना नदी के किनारे एक गुफा में सुरक्षित रखा, ताकि उसका विवाह न हो सके।
लेकिन एक दिन संयोग से राजा हंस की बेटी वहां पहुंच गई। राजकुमार को देखकर वह उस पर मोहित हो गई और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। भविष्यवाणी के अनुसार, विवाह के चौथे दिन राजकुमार की मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु पर उसकी पत्नी का विलाप देखकर यमदूत भी व्याकुल हो उठा।
यमदूत ने यमराज से पूछा कि क्या मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाने का कोई उपाय है। इस पर यमराज ने बताया कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को विधिपूर्वक पूजा करने और घर के बाहर दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होने की मान्यता है। तभी से धनतेरस की रात यमराज के नाम दीपदान करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
इसी धार्मिक विश्वास के चलते लोग धनतेरस की शाम घर के बाहर दीपक जलाकर यमराज से परिवार की रक्षा और सदस्यों की लंबी आयु की कामना करते हैं। इस प्रकार यम दीपक धनतेरस के पर्व को केवल धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य की मंगलकामना से भी जोड़ता है।
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