
भोपाल: देश में आने वाले लोकसभा चुनाव 2029 (Lok Sabha Elections 2029) से पहले एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. केंद्र सरकार (Central government) नारी वंदन अधिनियम (Women’s Reverence Act) लागू करने की तैयारी में है और इसके साथ ही निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है. सूत्रों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 816 तक करने पर विचार चल रहा है. इसका सीधा असर राज्यों पर पड़ेगा और मध्य प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहेगा.
मध्य प्रदेश में 15 सीटें बढ़ने की संभावना
मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की पूरी संभावना जताई जा रही है. अभी राज्य में कुल 29 लोकसभा सीटें हैं, लेकिन प्रस्तावित योजना के अनुसार यह संख्या बढ़कर 44 हो सकती है. यानी राज्य को 15 नई सीटें मिल सकती हैं. यह बढ़ोतरी न सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदल सकती है, बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को भी मजबूत करेगी. ज्यादा सीटों का मतलब होगा कि छोटे-छोटे इलाकों को भी संसद में अपनी आवाज उठाने का मौका मिलेगा.
क्यों जरूरी है सीटों का बढ़ना?
दरअसल, देश में आखिरी बार 1976 में परिसीमन हुआ था. तब से लेकर अब तक जनसंख्या में भारी बदलाव आया है. कई राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है, जबकि सीटों की संख्या वही बनी हुई है. मध्य प्रदेश में भी यही स्थिति है. राज्य का भौगोलिक और जनसंख्या विस्तार काफी बड़ा है, लेकिन प्रतिनिधित्व उसी हिसाब से नहीं बढ़ पाया. ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ाना एक जरूरी कदम माना जा रहा है.
1976 के परिसीमन में मध्य प्रदेश की स्थिति
अगर 1976 के डिलिमिटेशन ऑर्डर की बात करें, तो उस समय मध्य प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या 37 थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 40 किया गया था. इनमें 5 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और 8 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित थीं.
उस दौर में जिन प्रमुख क्षेत्रों के आधार पर सीटें बनी थीं, उनमें मुरैना, भिंड, ग्वालियर, गुना, शिवपुरी, सागर, दमोह, खजुराहो, रीवा, सतना, जबलपुर, भोपाल, इंदौर और उज्जैन जैसे इलाके शामिल थे. इसके अलावा मंडला और धार जैसे क्षेत्र ST के लिए आरक्षित थे. यह सूची दिखाती है कि उस समय भी राज्य के अलग-अलग हिस्सों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई थी, लेकिन समय के साथ जनसंख्या और क्षेत्रीय जरूरतें बदल चुकी हैं.
1951 के चुनाव में क्या थी स्थिति?
अगर और पीछे जाएं तो 1951 के पहले लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की स्थिति अलग थी. उस समय राज्य में कुल 29 संसदीय सीटें थीं, लेकिन निर्वाचन क्षेत्र (कॉनस्टिटुएंसी) सिर्फ 23 थे. इसकी वजह यह थी कि कुछ सीटें डबल-मेंबर थीं, यानी एक ही क्षेत्र से दो प्रतिनिधि चुने जाते थे. उस समय कुल मतदाता करीब 1.10 करोड़ थे. इनमें से 65 लाख मतदाता सिंगल-सीट क्षेत्रों में और करीब 45 लाख डबल-सीट क्षेत्रों में आते थे. उस दौर में ST के लिए सिर्फ 1 सीट आरक्षित थी, जबकि SC के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं थी.
महिला आरक्षण से भी जुड़ेगा मामला
नारी वंदन अधिनियम लागू होने के बाद लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलेगा. लेकिन यह आरक्षण तभी लागू होगा जब परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी माना जा रहा है, ताकि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जा सकें और मौजूदा राजनीतिक संतुलन भी बना रहे.
क्या बदलेंगे राजनीतिक समीकरण?
अगर मध्य प्रदेश में सीटें 29 से बढ़कर 44 होती हैं, तो इसका असर सीधे चुनावी रणनीतियों पर पड़ेगा. राजनीतिक दलों को नए क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी. साथ ही नए चेहरे भी राजनीति में उभर सकते हैं. कुल मिलाकर, 2029 से पहले होने वाला यह बदलाव न सिर्फ चुनावी गणित बदलेगा, बल्कि लोकतंत्र को और व्यापक और प्रतिनिधिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है.
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