
उज्जैन। त्रिवेणी संग्रहालय में करीब एक हजार साल पुरानी गणेश प्रतिमा रखी हुई है। और उससे जुड़ी जानकारी भी वहाँ उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि शहर के गणेश उत्सव का धूम आज शुरू हो चुकी हैं। इस बार 300 से अधिक स्थानों पर बुद्धि के देवता स्थापित किए गए हैं। ऐसे में अग्निबाण त्रिवेणी संग्रहालय में मौजूद उन प्राचीन गणेश मूर्तियों के दर्शन कराने जा रहा हैं, जो 1000 साल पुरानी हैं। त्रिवेणी संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष योगेश पाल ने बताया कि वर्तमान में पुरातत्व संग्रहालय में सात प्राचीन गणेश मूर्तियाँ मौजूद हैं। जिसमें दो मूर्तियाँ उज्जैन से और शेष पाँच मूर्तियाँ प्रदेश के शिवपुरी, पन्ना, रायसेन, टीकमगढ़, और शहडोल जिले से लाई गई हैं। इसमें 10वीं शताब्दी के पहले की लगभग 3 प्रतिमाएँ मौजूद हैं।
जो आज लगभग 1 हजार साल पुरानी हो गई है। यह तीनों मूर्तियाँ शिवपुरी, टीकमगढ़ और रायसेन में खुदाई के दौरान मिली थी। शेष चार गणेश मूर्तियाँ 10वीं शताब्दी के बाद की हैं। इसमें दो मूर्तियाँ उज्जैन क्षेत्र से उत्खनन में प्राप्त हुई और दो पन्ना और शहडोल से मिली। यह सभी मूर्तियाँ अपने आप में ऐतिहासिक और अनुपम है। सभी मूर्तियों की नक्काशी इतनी शानदार की गई है कि मूर्तियों को देखते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। श्री पाल ने बताया कि शहडोल से प्राप्त गणेश मूर्ति को ललितासन में ऊँची चौकी पर आसीन दिखाया गया है। गवाक्ष के दोनों ओर परिचारिकायें तथा नीचे वाहन मूषक का आलेखन है। पुरातत्व संग्रहालय में मौजूद यह मूर्ति लगभग 900 साल पुरानी हैं। केलधर जिला शिवपुरी से प्राप्त द्विभंग मुद्रा में प्रदर्शित गणेश प्रतिमा में गणेश को शिल्प विधान के अनुसार गजमुख व उन्नत उदर वाला दिखाया गया है। उनके दाये हाथों में अक्षमाला एवं सूत्र है। मूर्ति में सर्पयज्ञोपवीत एवं अन्य आभूषण शिल्प विधान के अनुसार अंकित हैं। यह मूर्ति लगभग एक हजार साल पुरानी हैं। पन्ना से प्राप्त गणेश की यह सुन्दर मूर्ति ललितासन में दिखायी गयी है। जिसमें उनके उपरी बाये हाथ में दंत निचले हाथ में मोदक पात्र है। गजमुख गणेश की यह प्रतिमा चंदेल कला की महत्वपूर्ण कलाकृति हैं। यह मूर्ति लगभग 900 साल प्राचीन हैं। उज्जैन से प्राप्त इस चतुर्भुजी प्रतिमा में ललितासन मुद्रा में आसीन गणेश को गजमुख उन्नत उदर एवं आभूषणों से सुसज्जित दिखाया गया है। उनके हाथों में परशु एवं नाग का आलेखन है। यह प्रतिमा परमार कला की महत्वपूर्ण कृति है। यह मूर्ति 13 वीं शताब्दी की हैं। उज्जैन से प्राप्त इस गणेश प्रतिमा में चतुर्भुजी देव को ललितासन में दिखाया गया है। गणेश के हाथों में दन्त परशु, पदम एवं मोदक है। प्रतिमा में गणेश का गजमुख उन्नत उदर शिल्प विधान के अनुरूप है। यह प्रतिमा परमार कला की महत्वपूर्ण कृति है। यह मूर्ति 12 वीं शताब्दी की हैं। टीकमगढ़ से प्राप्त शक्ति के दांये एक हाथ में कमलकलिका एवं दूसरे हाथ में दन्त है, बांए नीचे के हाथ से वे शक्ति को आलिंगन में लिए हुए है। यह प्रतिमा चन्देल कालीन कला की सुन्दर कृति है, जो 9वीं शताब्दी की अनुमानित है। आशापुरी जिला रायसेन से प्राप्त गणेश की इस प्रतिमा में उन्हें नृत्यरत दिखाया गया है। इस प्रतिमा का मुख्य आकर्षण गणेश के नृत्य में लय मिलाते तथा झांझ बजाते गणों का अंकन है। इस प्रकार कलाकार ने इस प्रतिमा के माध्यम से नृत्य एवं वादन कला का नैसर्गिक सामन्जस्य स्थापित किया है। यह मूर्ति भी एक हजार साल पुरानी हैं।