नई दिल्ली। भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता (India’s defence production capacity) को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम समझौता हुआ है। थेल्स और कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (KSSL) ने भारत में 70-मिमी नॉन-गाइडेड और लेजर-गाइडेड रॉकेट (Laser-guided rocket) के विकास और निर्माण के लिए साझेदारी की है। इस करार का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को देश में ही पूरा करना और भविष्य में भारतीय रक्षा उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाना है।
इस साझेदारी के तहत पहला पूरी तरह भारत में निर्मित रॉकेट 2027 की शुरुआत तक तैयार होने की उम्मीद है। यह समझौता बेल्जियम के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान हुआ, जिससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नया विस्तार मिला है।
थेल्स की 70-मिमी रॉकेट प्रणाली पहले से ही भारतीय सशस्त्र बलों में इस्तेमाल की जा रही है। इसे एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) और लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (LCH) जैसे प्लेटफॉर्म पर लगाया जा सकता है।
इन रॉकेटों की खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के मुताबिक हवाई, जमीन और नौसैनिक प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है। आधुनिक युद्ध में इनका इस्तेमाल विभिन्न लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है और ड्रोन से निपटने के लिए भी इनकी उपयोगिता बताई गई है।
थेल्स के मुताबिक, उसकी 70-मिमी रॉकेट प्रणाली दुनिया के 55 देशों की करीब 70 सशस्त्र सेनाओं में इस्तेमाल की जा रही है।
करार के तहत थेल्स की बेल्जियम इकाई अपनी तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराएगी, जबकि KSSL भारत में मौजूद अपनी इंजीनियरिंग, निर्माण और परीक्षण सुविधाओं का इस्तेमाल करेगी।
इससे भारत को सिर्फ रॉकेट असेंबल करने तक सीमित रहने के बजाय घरेलू स्तर पर इनके विकास और उत्पादन की क्षमता विकसित करने में मदद मिलेगी। इससे महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
थेल्स इंडिया के उपाध्यक्ष अंकुर कनागलेकर के मुताबिक, बेल्जियम की युद्ध-परीक्षित 70-मिमी रॉकेट विशेषज्ञता और KSSL की इंजीनियरिंग व मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को एक साथ लाने से भारत की परिचालन तैयारियों को मजबूत करने और महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
इस समझौते का फायदा सिर्फ भारतीय सशस्त्र बलों को ही मिलने की उम्मीद नहीं है। चूंकि थेल्स की 70-मिमी रॉकेट प्रणाली पहले से कई देशों में इस्तेमाल और स्वीकृत है, इसलिए भारत में निर्मित रॉकेटों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार भी खुल सकता है।
अगर भारत इन रॉकेटों का निर्यात करने में सफल रहता है तो इससे देश के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही भारतीय कंपनियों को वैश्विक डिफेंस सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
भारत दुनिया के बड़े सैन्य खर्च करने वाले देशों में शामिल है और लंबे समय तक अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी आयात पर काफी निर्भर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने घरेलू रक्षा उत्पादन और रक्षा निर्यात बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है।
थेल्स और KSSL की यह साझेदारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। स्थानीय उत्पादन से भारतीय सशस्त्र बलों के लिए जरूरी गोला-बारूद की उपलब्धता बढ़ सकती है और संकट के समय विदेशी सप्लाई पर निर्भरता घटाई जा सकती है।
70-मिमी रॉकेट प्रणाली की बहु-प्लेटफॉर्म क्षमता इसे भारतीय वायुसेना, थलसेना और नौसेना के लिए उपयोगी बना सकती है। भारत में उत्पादन शुरू होने के बाद स्थानीय सप्लाई, रखरखाव और उत्पादन क्षमता विकसित होने की संभावना है।
अगर परियोजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो 2027 की शुरुआत में पहला मेड-इन-इंडिया रॉकेट सामने आ सकता है। यह भारत-बेल्जियम रक्षा सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ देश के स्वदेशी रक्षा उद्योग और भविष्य के रक्षा निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
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