
नई दिल्ली। देश के महानगरों (Metropolitan cities) में तेजी से बढ़ते शहरीकरण (Urbanization) और महंगे होते आवास ने परिवारों के बीच दूरियां बढ़ा दी हैं। मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु जैसे शहरों में लाखों कामकाजी दंपति अपने बुजुर्ग माता-पिता (Elderly parents) से अलग रहने को मजबूर हैं। इसकी वजह केवल व्यस्त जीवनशैली नहीं, बल्कि आसमान छूती प्रॉपर्टी कीमतें और घर खरीदने की ऊंची लागत भी है।
मुंबई की एक कामकाजी महिला नेहा की कहानी ऐसे ही लाखों परिवारों की हकीकत बयां करती है। वह चाहती हैं कि उनके माता-पिता उनके पास रहें ताकि परिवार साथ समय बिता सके और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे का सहारा बन सके। लेकिन महंगे मकानों और स्टांप ड्यूटी के कारण यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा।
इसी चुनौती का समाधान सिंगापुर ने एक अनोखी योजना के जरिए तलाशा है। वहां सरकार ने ‘प्रॉक्सिमिटी हाउसिंग ग्रांट’, जिसे ‘कैश फॉर क्लोजनेस’ भी कहा जाता है, लागू कर परिवारों को एक-दूसरे के करीब रहने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देना शुरू किया है।
क्या है ‘कैश फॉर क्लोजनेस’ योजना?
सिंगापुर के हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड (HDB) ने वर्ष 2015 में इस योजना की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य लोगों को अपने माता-पिता या बच्चों के नजदीक घर खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना है।
योजना के तहत यदि कोई विवाहित दंपति अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए रीसेल फ्लैट खरीदता है तो सरकार उसे 30,000 सिंगापुर डॉलर (करीब 21 लाख रुपये) तक की नकद सहायता देती है।
यदि परिवार एक ही घर में नहीं रहता, लेकिन माता-पिता या बच्चों के घर से 4 किलोमीटर के दायरे में नया फ्लैट खरीदता है, तो 20,000 सिंगापुर डॉलर (करीब 15 लाख रुपये) की सब्सिडी मिलती है।
35 वर्ष से अधिक आयु के अविवाहित नागरिकों के लिए भी योजना में प्रावधान है। यदि वे अपने माता-पिता के साथ या उनके 4 किलोमीटर के भीतर घर खरीदते हैं तो उन्हें 10,000 से 15,000 सिंगापुर डॉलर तक की सहायता प्रदान की जाती है।
इस योजना की खास बात यह है कि इसमें आय की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। अमीर हो या मध्यम वर्ग, यदि परिवार के करीब रहकर घर खरीदा जाता है तो सभी इस सहायता के पात्र हैं। HDB अब तक 12 लाख से अधिक फ्लैट उपलब्ध करा चुका है और हजारों परिवार इस योजना का लाभ उठा चुके हैं।
योजना से हुए तीन बड़े बदलाव
इस नीति का असर केवल आवास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
– बुजुर्ग माता-पिता अब अकेलेपन से काफी हद तक बाहर आए हैं। वे अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ समय बिता पा रहे हैं, जिससे उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।
– कामकाजी दंपतियों को बच्चों की देखभाल में परिवार का सहयोग मिलने लगा है। इससे डे-केयर और क्रेच पर होने वाला खर्च कम हुआ है और बच्चों को पारिवारिक माहौल भी मिल रहा है।
– परिवारों के एक-दूसरे की जिम्मेदारी संभालने से सरकार पर बुजुर्गों की देखभाल और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का वित्तीय बोझ भी घटा है।
भारत के लिए क्या हैं सबक?
भारत के महानगरों में रहने वाली 30 से 45 वर्ष की पीढ़ी आज बच्चों की परवरिश और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है। दूसरी ओर, बड़े शहरों में पिछले कुछ वर्षों में मकानों की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि ने परिवार के पास दूसरा घर खरीदना मुश्किल बना दिया है।
हालांकि केंद्र सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाएं चला रही है, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य आवास उपलब्ध कराना है। यदि भविष्य की शहरी आवास नीति में परिवारों की निकटता को भी प्राथमिकता दी जाए तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि माता-पिता के 3 से 5 किलोमीटर के दायरे में घर खरीदने वालों को स्टांप ड्यूटी में 2 से 3 प्रतिशत की छूट या होम लोन पर अतिरिक्त ब्याज सब्सिडी जैसी सुविधाएं दी जाएं, तो संयुक्त परिवारों को बढ़ावा मिल सकता है। शुरुआत में इसे चुनिंदा शहरों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू कर बाद में देशभर में विस्तार दिया जा सकता है।
ऐसी नीति से न केवल परिवारों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी, बल्कि रियल एस्टेट क्षेत्र को भी नई गति मिल सकती है। भविष्य के स्मार्ट शहर केवल आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर से नहीं, बल्कि परिवारों को करीब लाने वाली नीतियों से भी पहचाने जाएंगे।
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