
लखनऊ। अयोध्या (Ayodhya) के राम मंदिर (Ram Mandir) में चढ़ावे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra Trust) को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय (Champat Rai) हैं, जिनकी भूमिका और जिम्मेदारियों को लेकर अब खुलकर चर्चा हो रही है।
राम मंदिर निर्माण की पूरी प्रक्रिया में चंपत राय को सबसे प्रभावशाली और निर्णायक चेहरों में गिना जाता रहा है। मंदिर निर्माण से जुड़े अधिकांश प्रशासनिक और संगठनात्मक फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही। ऐसे में मंदिर परिसर और ट्रस्ट के संचालन से जुड़े किसी भी विवाद की जवाबदेही भी स्वाभाविक रूप से उन तक पहुंच रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े वरिष्ठ प्रचारक रहे चंपत राय की पहचान एक सादगीपूर्ण, अनुशासित और कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति के रूप में रही है। अयोध्या में लंबे समय तक सक्रिय रहने के कारण संत समाज, अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी। हालांकि, मंदिर निर्माण और ट्रस्ट गठन के दौरान उनके कार्य करने के तरीके को लेकर कई संतों और आंदोलन से जुड़े नेताओं में असंतोष भी देखने को मिला।
ट्रस्ट गठन के बाद बढ़ी नाराजगी
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के समय से ही कुछ संतों और आंदोलन से जुड़े पुराने कार्यकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कई लोगों को निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया। उनका मानना था कि आंदोलन के दौरान संघर्ष करने वाले अनेक साधु-संत और संगठनों को ट्रस्ट में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
हालांकि ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में महंत नृत्य गोपाल दास की नियुक्ति की गई, लेकिन आरोप लगते रहे कि वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रही। इसी कारण समय-समय पर ट्रस्ट के भीतर और बाहर असहमति की आवाजें उठती रहीं।
विवाद के बाद मुखर हुए विरोधी
चढ़ावे से जुड़े विवाद के सामने आने के बाद लंबे समय से असंतुष्ट रहे कई संत और आंदोलन से जुड़े नेता खुलकर सामने आ गए हैं। पूर्व सांसद विनय कटियार, संतोष दुबे और छोटी छावनी से जुड़े संतों सहित कई लोगों ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
हालांकि समय के साथ कुछ नेताओं के तेवर नरम भी पड़े, लेकिन इस विवाद ने ट्रस्ट के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर बहस को तेज कर दिया है।
ईमानदारी की छवि, लेकिन जवाबदेही पर सवाल
चंपत राय की व्यक्तिगत ईमानदारी पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने वालों की संख्या कम रही है। उनके सादगीपूर्ण जीवन और लंबे सार्वजनिक जीवन को देखते हुए कई लोग उन्हें निष्कलंक मानते हैं। इसके बावजूद चढ़ावे से जुड़े विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है, तो उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संस्थान में शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह माना जाता है, भले ही जांच में उसकी व्यक्तिगत संलिप्तता साबित हो या नहीं।
जांच के नतीजों पर टिकी निगाहें
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने भी मंदिर प्रबंधन में कुछ कमियों और गड़बड़ियों की ओर संकेत किया है, हालांकि उन्होंने चंपत राय के सार्वजनिक जीवन को निष्कलंक बताया। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बिना किसी का नाम लिए चरित्र हनन से बचने की बात कही है।
अब सबकी नजर जांच एजेंसियों और विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट पर टिकी है। यह जांच तय करेगी कि कथित चढ़ावा चोरी मामले में किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की प्रत्यक्ष भूमिका रही या नहीं।
ट्रस्ट में हो सकते हैं बड़े बदलाव
विवाद के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ढांचे में बदलाव किए जा सकते हैं। भविष्य में अधिक पेशेवर और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर ट्रस्ट के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारियों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच में चंपत राय और अन्य प्रमुख पदाधिकारियों को क्लीन चिट मिलती है या फिर इस विवाद की आंच ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचती है।
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