
नई दिल्ली: आजादी के करीब 80 साल बाद असम के डिब्रूगढ़ से पहली अंतरराष्ट्रीय कार्गो खेप बांग्लादेश के लिए रवाना हुई. केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बोगीबील टर्मिनल से इस पहली यात्रा को हरी झंडी दिखाई. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कार्यक्रम में वर्चुअली शामिल हुए. इस कार्गो में 1,080 टन मेथनॉल है, जिसे असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड यानी APCL ने तैयार किया है. दो जहाजों में कुल 54 ISO टैंक कंटेनर लदे हैं और हर कंटेनर में करीब 20 टन मेथनॉल है. दोनों जहाजों में 540-540 टन माल ले जाया जा रहा है.
यह कार्गो बोगीबील से नेशनल वॉटरवे-2 यानी ब्रह्मपुत्र के रास्ते आगे बढ़ेगा. इसके बाद जहाज भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल रूट के जरिए बांग्लादेश में प्रवेश करेंगे और ढाका के पंगाओं बंदरगाह तक पहुंचेंगे. बोगीबील से बांग्लादेश सीमा तक करीब 783 किलोमीटर का जलमार्ग है और इस हिस्से को तय करने में लगभग सात दिन लगने का अनुमान है. अब असम के औद्योगिक इलाके से तैयार हुआ माल अब सड़क या रेल के बजाय नदी के रास्ते सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचने की नई संभावना के साथ रवाना हुआ है.
इस पूरी कहानी का एक दिलचस्प हिस्सा उन दो जहाजों से जुड़ा है, जिनका इस्तेमाल इस कार्गो के लिए किया जा रहा है. ये जहाज असम सरकार के अंतर्देशीय जल परिवहन विभाग के थे और करीब तीन दशक से इस्तेमाल में नहीं थे. APCL ने इन्हें लीज पर लिया और गुवाहाटी के पांडू में मरम्मत कराकर दोबारा व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए तैयार किया. अब यही जहाज ब्रह्मपुत्र के रास्ते पहली अंतरराष्ट्रीय कार्गो खेप लेकर जा रहे हैं.
इस यात्रा के साथ बोगीबील का नया इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट टर्मिनल भी अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक परिचालन की दिशा में आगे बढ़ रहा है. टर्मिनल पर कार्गो जेट्टी, गोदाम और कस्टम सुविधाएं तैयार की गई हैं. केंद्र सरकार और IWAI की कोशिश है कि बोगीबील को सिर्फ स्थानीय माल ढुलाई का केंद्र न रखकर पूर्वोत्तर के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने वाले एक अहम जलमार्ग के तौर पर विकसित किया जाए.
पहली खेप मेथनॉल की है, लेकिन आगे इस रूट पर कई दूसरे उत्पादों को भेजने की संभावना है. इसमें पॉलिमर, पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, चाय, कृषि उत्पाद और असम के GI टैग वाले उत्पाद शामिल हो सकते हैं. इससे ऊपरी असम और पूर्वोत्तर के उत्पादकों को बांग्लादेश के जरिए दूसरे बाजारों तक पहुंच बनाने का विकल्प मिल सकता है.
ब्रिटिश दौर में ब्रह्मपुत्र ऊपरी असम के कारोबार की बड़ी लाइफलाइन था. डिब्रूगढ़ एक महत्वपूर्ण नदी बंदरगाह के रूप में विकसित हुआ था. चाय, लकड़ी और दूसरे सामानों की आवाजाही ब्रह्मपुत्र के रास्ते होती थी और यह नेटवर्क असम को देश के दूसरे हिस्सों और बाहरी बाजारों से जोड़ता था, लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद पुराने कारोबारी संपर्क और नदी मार्ग का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया. अब करीब आठ दशक बाद उसी ऐतिहासिक कनेक्टिविटी को नए स्वरूप में दोबारा खड़ा करने की कोशिश हो रही है.
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved