
जबलपुर। डीजे पर प्रतिबंध के आदेश कागजों पर सख्त रहे, लेकिन महाकाली विसर्जन जुलूस के दौरान गौरीघाट में जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आई। तेज आवाज में बजते डीजे ने पूरी रात क्षेत्र के लोगों की नींद उड़ा दी, लेकिन शोर पर लगाम लगाने के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मी मौके पर नजर नहीं आए। बंदरिया तिराहे से लेकर विसर्जन स्थल तक पुलिस की गैरमौजूदगी को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी रही। सवाल यह है कि जब प्रशासन ने डीजे पर प्रतिबंध लगाया था, तो विसर्जन जुलूस में नियमों की खुलेआम अनदेखी कैसे होती रही?
प्रतिबंध था तो डीजे बजने कैसे दिए?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब प्रशासन ने डीजे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था, तब महाकाली विसर्जन जुलूस में तेज आवाज में डीजे बजने की अनुमति कैसे मिली? क्या आयोजकों को नियमों की जानकारी नहीं थी, या फिर नियमों का पालन कराने के लिए पर्याप्त निगरानी नहीं की गई? लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि आम नागरिकों को पूरी रात परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन शिकायतों के बावजूद राहत नहीं मिली। दूसरी ओर, प्रशासन की ओर से तेज आवाज में डीजे बजने के मामले की जांच कराने की बात कही गई है। अब देखना होगा कि जांच में जिम्मेदारी तय होती है या मामला केवल आश्वासन तक सीमित रह जाता है। आदेश जारी करना काफी नहीं, उनका पालन कराना भी जरूरी है। गौरीघाट की रात ने डीजे प्रतिबंध के क्रियान्वयन और पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोग अब जांच और कार्रवाई के साथ यह भी चाहते हैं कि भविष्य में धार्मिक आयोजनों के नाम पर उनकी नींद और शांति से समझौता न हो।
बंदरिया तिराहे से विसर्जन स्थल तक पुलिस नदारद
विसर्जन के दौरान बंदरिया तिराहे से लेकर गौरीघाट के विसर्जन स्थल तक पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति स्थानीय लोगों की नाराजगी का बड़ा कारण बनी। धार्मिक आयोजन के दौरान भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था और ध्वनि संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। तेज आवाज में डीजे बजते रहे और उन्हें रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आई। यदि शिकायतों के बाद भी मौके पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रतिबंध का उद्देश्य केवल आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उसका पालन सुनिश्चित करना भी है।
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