
ट्रैफिक के नाम पर सिसकता शहर… लोगों की कुर्बानी लेकर चौड़ी हुई सड़कों पर बिखरी पड़ी पार्किंग की गाड़ियां… जिसकी मर्जी आए वो वहां गाड़ियां खड़ी करता है…कुछ बोले तो अकड़ता है… दुकानदार का धंधा चलता है, इसीलिए वो खामोश रहता है… लेकिन पूरे शहर का ट्रैफिक इन सड़कों से रोता, सिसकता गुजरता है… करोड़ों खर्च कर दुकानों, मकानों की बलि लेकर चौड़ी की गई सड़कों पर अतिक्रमणकारियों और बिगड़ैल मिजाज लोगों का कब्जा नजर आता है… इस दुविधा को दूर करने के लिए निगम और जिला प्रशासन ने वाहन पार्किंग शुल्क लगाने का फैसला क्या लिया सिरफिरे कांग्रेसी और गांवड़ेली मनोवृत्ति के दकियानूसी लोग विरोध में खड़े हो गए…और यह विरोध भी इस बात का है कि शहर की दशा सुधारने के लिए…सड़कों पर खड़ी होती बढ़ती गाड़ियों पर लगाम लगाने के लिए…लोगों की मनोवृत्ति सुधारने के लिए 10-20 रुपए क्यों लिए जा रहे हैं…निगम बिना पैसे के जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा रहा है…कोई आरटीओ द्वारा लिए जा रहे पार्किंग शुल्क का तर्क दे रहा है तो कोई इसे जनता पर बोझ बता रहा है…लेकिन यह समझ ही नहीं पा रहा है कि लाखों रुपए की कारों और वाहनों के मालिक यदि 5-50 रुपए का पार्किंग शुल्क नहीं दे सकते हैं तो वो कार खरीदते क्यों हैं और खरीदते हैं तो घरों में ही क्यों नहीं रखते हैं…और जहां तक आरटीओ के पार्किंग शुल्क का सवाल है वो पार्किंग नहीं, बल्कि पार्किंग विकास शुल्क है, यानी पार्किंग के लिए स्थानों का विकास करने का… अब जो स्थान तय किए जा रहे हैं उन पर सलीके से पार्किंग कराने और लोगों को सुविधा उपलब्ध कराने के लिए यदि कोई छोटा-मोटा शुल्क लिया जाता है तो आपत्ति क्यों होना चाहिए… कोठारी मार्केट सहित ऐसे कई स्थान हैं जहां शुल्क पर पार्किंग के कारण 10 की जगह 30 गाड़ियां खड़ी होती हैं… वहां लोग हंसते-मुस्कराते शुल्क चुकाते हैं, क्योंकि वो पार्किंग पाते हैं… लेकिन हम ऐसी सुविधा का भी विरोध करने खड़े हो जाते हैं…इसी विरोध के चलते निगम शुल्क लगाने के निर्णय पर डगमगा रहा है… महापौर परिषद को प्रस्ताव के विरोध का डर सता रहा है… कांग्रेसी तो कांग्रेसी कम अक्ल भाजपाई भी समर्थन से कतरा रहे हैं और शहरहित के एक अच्छे निर्णय पर पीछे हटते नजर आ रहे हैं… सड़कों पर पार्किंग कराना न तो निगम की जिम्मेदारी है और न ही प्रशासन की… यह जिम्मेदारी होती है पुलिस की… लेकिन पुलिस के पास न महकमा है न जवान… वैसे भी सड़क चलने के लिए होती है, वाहनों की पार्किंग के लिए नहीं और यदि निगम और प्रशासन यह सुविधा दे रहा है तो वो लोगों की जरूरतों का लिहाज कर रहा है… वरना शहर में क्रेन दौड़ाई जाएगी और खड़े वाहनों को हटाएगी…तब दुकानदार ग्राहकों के हाथ जोड़कर वाहनों को हटाने की गुहार लगाएंगे और वाहन खड़े करने वाले क्रेन वालों के सामने गिड़गिड़ाएंगे… तब न कांग्रेसी नजर आएंगे और न ही विरोधी मुंह दिखाएंगे… शहर फिर बेतरतीब पार्किंग से जूझता नजर आएगा और मिनटों का सफर घंटों में भी पूरा नहीं हो पाएगा… पता नहीं यह शहर और यहां के नेता कब समझ पाएंगे कि वो किसी गांव में नहीं, बल्कि विकसित होते शहर में राजनीति करते हैं… इंदौर में शुल्क लेकर पार्किंग की अनुमति दी जा रही है, वरना मुंबई में तो गाड़ी खड़ी करने की कोई जुर्रत तक नहीं कर पाता है…जब तक वाहन मालिक दुकानों पर खरीदारी करता है, तब तक ड्राइवर गाड़ी लेकर सड़कों पर घूमता है…वहां मल्टीलेवल कार पार्किंग भी कई किलोमीटर दूर होती है और वहां भी गाड़ियां मुफ्त में नहीं पैसे देकर खड़ी होती हैं…हम शहर को मुंबई का बच्चा मानते हैं, लेकिन मुफ्तखोरी के लिए गांववालों की तरह तर्क करते नजर आते हैं…निगम और प्रशासन को निर्णय से पीछे नहीं हटना चाहिए…वाहनों के पार्किंग का शुल्क लेना चाहिए और पार्किंग की जगह भी तय रखना चाहिए, ताकि यातायात भी सुगम हो और दुकानें भी चलती रहें… जनता को सुविधा भी मिले और इस वह तनाव से भी मुक्त रहे कि सड़क पर खड़ी उनकी गाड़ी पर कोई सवाल उठाएगा या बवाल मचाएगा…
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