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एलन मस्क की मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने की तैयारी, जानें पहले इंसान जाएंगे या रोबोट?

February 08, 2026

नई दिल्ली. क्या धरती (Earth) हमेशा-हमेशा रहेगी? क्या इंसान (humans) धरती के बाहर भी अपनी कॉलोनियां (colony) बसाएगा? क्या बाकी ग्रहों पर भी जिंदगी संभव है? ये कुछ सवाल हैं जिनके जवाब विज्ञान लंबे समय से तलाश रहा है, लेकिन अब कई कोशिशें रंग दिखाने लगी हैं. भारत (India) समेत कई देश मंगल मिशन (Mars Mission) के जरिए उस ग्रह के रहस्यों को सुलझाने में लगे हैं, तो एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेस-एक्स मंगल ग्रह पर शहर बसाने की तैयारी में जुटी है. आखिर कहां तक पहुंची है ये तैयारी और ये कोशिश अंतरिक्ष में संभावनाओं के द्वार किस हद तक खोल पाएगी?

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कल को धरती पर कोई बड़ी आफत आ जाए- जैसे कोई बड़ा एस्टेरॉयड टकरा जाए या कोई लाइलाज वायरस फैल जाए- तो हम इंसानों का क्या होगा?


  • आज से ठीक 10 साल पहले, मैक्सिको के एक खचाखच भरे हॉल में एलन मस्क ने यही सवाल दुनिया से पूछा था- ‘इतिहास दो रास्तों में बंटने वाला है. एक रास्ता यह है कि हम हमेशा के लिए धरती पर ही रहें और किसी न किसी दिन खत्म हो जाएं. दूसरा रास्ता है एक ‘मल्टी-प्लैनेटरी स्पीशीज’ बनना.’ उसी दिन से मस्क ने कसम खा ली कि वो लाल ग्रह यानी मंगल को इंसानों का दूसरा घर बनाकर ही दम लेंगे. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मस्क सच में हमें मंगल पर ले जाने के लिए तैयार हैं? और अगर ये संभव है, तो वहां पहला कदम किसका होगा- एक हाड़-मांस के इंसान का या लोहे के बने रोबोट का?

    मस्क का सपना है कि 2050 तक मंगल पर 10 लाख लोगों का एक आत्मनिर्भर शहर हो. उनका प्लान किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा है. मंगल ग्रह की जानलेवा ठंड और जहरीली हवा में वे सीधे इंसानों को नहीं झोंकेंगे. उनकी योजना है कि पहले टेस्ला के ऑप्टिमस ह्यूमनॉइड रोबोट्स को वहां उतारा जाए.

    ये रोबोट्स वहां एडवांस पार्टी की तरह जाएंगे और इंसानों के पहुंचने से पहले आवास, सोलर पैनल और सबसे जरूरी- ऑक्सीजन बनाने वाली मशीनें तैयार करेंगे. वे जमीन के नीचे दबी बर्फ खोजेंगे ताकि पीने का पानी और रॉकेट फ्यूल तैयार किया जा सके. ताकि जब इंसान वहां पहुंचेंगे, तो उन्हें बुनियादी सुविधाएं तैयार मिलें.

    इस महातैयारी का केंद्र है अमेरिका के टेक्सास में स्थित स्पेसएक्स का स्टारबेस. एलन मस्क इसे मार्स का दरवाजा कहते हैं. यहां हर साल सैकड़ों स्टारशिप रॉकेट बनाने का लक्ष्य है. इस मिशन में दुनिया के टॉप इंजीनियर्स जुटे हैं और नासा भी स्पेस-रिफ्यूलिंग जैसी तकनीक पर सहयोग कर रहा है. इस मिशन का असली ब्रह्मास्त्र है स्टारशिप V3. यह 500 फीट ऊंचा स्टील का दानव अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसमें लगे रैप्टर-3 इंजन एक बार में 100 टन से ज्यादा सामान मंगल तक ले जा सकते हैं.

    मस्क ने टारगेट सेट किया है- दिसंबर 2026. ये वो वक्त होगा जब पृथ्वी और मंगल एक-दूसरे के सबसे करीब होंगे. मस्क की योजना है कि इस दौरान कम से कम 5 बिना इंसान वाले स्टारशिप मंगल पर भेजे जाएं. अगर ये सुरक्षित लैंड कर गए, तो अगले 4 साल में इंसानों को भेजना शुरू किया जाएगा. लेकिन अगर ये क्रैश हुए, तो मिशन 2 साल और आगे खिसक जाएगा.

    वहां चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं. क्योंकि, अगर आप मंगल को पृथ्वी जैसा समझ रहे हैं, तो रुक जाइए. मंगल एक बेहद खतरनाक दुनिया है. वहां का औसत तापमान -62°C रहता है. वहां की हवा में 95% कार्बन डाइऑक्साइड है और ऑक्सीजन 1% से भी कम. वहां का वायुमंडल इतना पतला है कि वह सूरज की घातक रेडिएशन को रोक नहीं पाता, जिससे कैंसर का खतरा बहुत ज्यादा रहता है. साथ ही, वहां उठने वाले धूल के विशाल तूफान कई हफ्तों तक सूरज की रोशनी रोक देते हैं.

    धरती बनाम मंगल
    जहां धरती पर एक दिन 24 घंटे का होता है, वहीं मंगल पर एक दिन 24 घंटे 37 मिनट का होता है. गुरुत्वाकर्षण के मामले में मंगल काफी कमजोर है. वहां पृथ्वी के मुकाबले केवल 38% ग्रेविटी है, यानी अगर आपका वजन धरती पर 100 किलो है, तो मंगल पर आप खुद को सिर्फ 38 किलो का महसूस करेंगे और लंबी छलांगें लगा सकेंगे. मंगल आकार में पृथ्वी से लगभग आधा है, लेकिन वहां का एक साल पृथ्वी के 687 दिनों मतलब लगभग दो साल के बराबर होता है. सबसे बड़ा अंतर सूर्यास्त का है. जहां धरती पर डूबता सूरज लाल दिखता है, वहीं मंगल के पतले वायुमंडल के कारण वहां नीला सूर्यास्त दिखता है.

    मंगल ग्रह के कई रहस्य हैं जिन्हें सुलझान में भारत का भी रोल बड़ा है. मंगल की इस रेस में भारत का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है. हम दुनिया के पहले ऐसे देश हैं जो 2014 में पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुंच गए थे. अब इसरो मंगलयान-2 की तैयारी कर रहा है. इस बार भारत सिर्फ चक्कर नहीं लगाएगा, बल्कि मंगल की सतह पर अपना लैंडर और रोवर उतारने की तैयारी में है. इसरो की सटीक रिसर्च मस्क जैसे मिशनों के लिए रोडमैप का काम कर सकती है.

    हालांकि, मस्क के मंगल मिशन यानी वहां इंसानी कॉलोनियां बसाने के प्लान की सफलता को लेकर काफी चर्चाएं होती रही हैं. मस्क ने खुद स्वीकार किया कि मंगल की पहली यात्राएं बहुत खतरनाक होंगी. उन्होंने यहां तक कहा कि मंगल पर बसने की शुरुआती कोशिशों में सफलता का चांस फिलहाल 50-50 ही है. लेकिन कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां इतिहास लिखा जा रहा है. हो सकता है अगले 20-30 साल में मंगल पर हमारा अपना कोई रिश्तेदार रह रहा हो, या हम खुद भी!

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