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गगनयान मिशन को मिली नई ताकत, ISRO ने परखी अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी की तकनीक, 2026 के मानवरहित मिशन पर नजरें

October 18, 2026
नई दिल्ली। भारत (India)के अंतरिक्ष अभियान (Space Missions)के लिए गगनयान मिशन (Gaganyaan mission)एक ऐतिहासिक उपलब्धि (historic achievement)साबित हो सकता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO इस मिशन को सफल बनाने के लिए लगातार महत्वपूर्ण परीक्षण कर रहा है। इसी कड़ी में इसरो ने क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल को अलग करने से जुड़े अहम परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। यह परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में जब भारतीय अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे तो उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने में इस तकनीक की बड़ी भूमिका होगी। इस सफलता से गगनयान के पहले मानवरहित मिशन G1 की तैयारियों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने और मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित वापस लाने की योजना है। इस अभियान में अंतरिक्ष यान के अलग-अलग हिस्सों का सही तरीके से काम करना बेहद जरूरी है। गगनयान के ऑर्बिटल मॉड्यूल में मुख्य रूप से दो हिस्से होते हैं। पहला क्रू मॉड्यूल है जिसमें अंतरिक्ष यात्री यात्रा करेंगे। दूसरा सर्विस मॉड्यूल है जो मिशन के दौरान जरूरी सेवाएं और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराता है। अंतरिक्ष यान के उड़ान भरने के समय दोनों मॉड्यूल एक साथ जुड़े रहते हैं और अपने निर्धारित कार्य करते हैं।
मिशन का सबसे महत्वपूर्ण चरण तब आता है जब क्रू मॉड्यूल को पृथ्वी पर वापस लाना होता है। इस दौरान उसे सर्विस मॉड्यूल से अलग करना पड़ता है। दोनों मॉड्यूल के बीच बिजली और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए कई कनेक्शन होते हैं जिन्हें तय प्रक्रिया के तहत अलग किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई तकनीकी उपकरण एक साथ काम करते हैं। यदि किसी कनेक्शन या अलग करने वाले सिस्टम में गड़बड़ी होती है तो अंतरिक्ष यान की वापसी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इसरो पहले ही इन प्रणालियों की क्षमता और विश्वसनीयता को परख रहा है ताकि वास्तविक मिशन के दौरान किसी भी संभावित जोखिम को कम किया जा सके।
यह परीक्षण केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में किया गया। यहां क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल को जोड़कर ऐसी व्यवस्था तैयार की गई जिससे वास्तविक उड़ान के दौरान होने वाली प्रक्रिया का आकलन किया जा सके। परीक्षण में यह जांचा गया कि दोनों मॉड्यूल को जोड़ने वाले कनेक्शन निर्धारित समय पर अलग हो सकते हैं या नहीं। इसके साथ ही अलगाव के दौरान उत्पन्न होने वाले झटकों और उनके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए विभिन्न तकनीकी प्रणालियों की मजबूती भी परखी गई।
इसरो ने एवियोनिक्स इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम हीट शील्ड और तैनात होने वाली अंबिलिकल शील्ड जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों की कार्यक्षमता की भी जांच की। ये सिस्टम अंतरिक्ष यान को सही दिशा में बनाए रखने और पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय जरूरी सुरक्षा प्रदान करने में मदद करते हैं। वापसी के दौरान क्रू मॉड्यूल को अत्यधिक तापमान का सामना करना पड़ता है इसलिए उसकी सुरक्षा व्यवस्था का सही तरीके से काम करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा तापमान और नमी नियंत्रित करने वाले उपकरणों की भी जांच की गई।
अब इसरो की नजर गगनयान के पहले मानवरहित मिशन G1 पर है। वर्ष 2026 में इस मिशन को भेजने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के बिना यान को अंतरिक्ष में भेजकर विभिन्न प्रणालियों और सुरक्षा प्रक्रियाओं का परीक्षण किया जाएगा। इस उड़ान से मिलने वाले परिणाम आगे के मिशनों की तैयारियों में मदद करेंगे। गगनयान की सफलता भारत को मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकती है। साथ ही यह देश की वैज्ञानिक क्षमता और स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

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