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Gen-Z से ‘मन की बात’ तक…अलग-अलग पीढ़ियों से संवाद के लिए बदलता रहा PM मोदी का कम्युनिकेशन मॉडल

September 17, 2026

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का 76वां जन्मदिन (Birthday) आज मनाया जा रहा है। 17 सितंबर 1950 को जन्मे मोदी 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। करीब 12 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में उनकी सार्वजनिक संवाद शैली में कई बदलाव दिखाई दिए हैं—कभी सोशल मीडिया और रील्स के जरिए युवाओं से सीधा संवाद, कभी छात्रों के साथ ‘परीक्षा पे चर्चा’ (Pariksha Pe Charcha), तो कभी ‘मन की बात’ (Mann Ki Baat) जैसे पारंपरिक माध्यम से परिवारों और बुजुर्गों तक पहुंच।

मोदी के संवाद की एक खासियत यह रही है कि अलग-अलग वर्गों से बात करते समय मंच और भाषा दोनों बदलते दिखाई देते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारों से लेकर डिजिटल क्रिएटर, स्टार्टअप, एआई और गेमिंग जैसे विषयों तक, उनके सार्वजनिक संवाद में अलग-अलग पीढ़ियों और रुचियों से जुड़े मुद्दे शामिल रहे हैं।

Gen-Z के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल भाषा
युवाओं तक पहुंच बनाने में सोशल मीडिया प्रधानमंत्री के संवाद का अहम माध्यम बना है। जुलाई 2026 में उनकी एक इंस्टाग्राम रील ने 24 घंटे में 303 मिलियन से अधिक व्यूज हासिल किए और उस समय 24 घंटे में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली इंस्टाग्राम रील का रिकॉर्ड बनाया। यह वीडियो छात्रों और पेपर लीक से जुड़े मुद्दे पर था।


  • इसके अलावा गेमिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप और डिजिटल क्रिएटर इकोसिस्टम जैसे विषयों पर भी प्रधानमंत्री युवाओं से संवाद करते रहे हैं। 2024 में पहली बार नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड आयोजित किया गया। इसमें स्टोरीटेलिंग, सामाजिक बदलाव, शिक्षा, गेमिंग, टेक्नोलॉजी और दूसरे डिजिटल क्षेत्रों में काम करने वाले क्रिएटर्स को अलग-अलग श्रेणियों में सम्मान दिया गया।

    इस पहल ने डिजिटल क्रिएटर इकोसिस्टम को सरकारी स्तर पर एक औपचारिक मंच भी दिया। पहला नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड मार्च 2024 में भारत मंडपम में प्रदान किया गया था।

    ‘परीक्षा पे चर्चा’ में प्रधानमंत्री की भूमिका अलग
    छात्रों के साथ संवाद के लिए ‘परीक्षा पे चर्चा’ एक अलग प्रारूप बन चुका है। 2018 में शुरू हुआ यह कार्यक्रम परीक्षा, तनाव, समय प्रबंधन, आत्मविश्वास और जीवन कौशल जैसे विषयों पर छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ बातचीत का मंच है।

    2026 के संस्करण में 4.5 करोड़ से ज्यादा छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने पंजीकरण कराया। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, कार्यक्रम के साथ जुड़ी गतिविधियों में 2.26 करोड़ अतिरिक्त प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

    इस कार्यक्रम की भाषा आम राजनीतिक भाषणों से अलग रखी जाती है। प्रधानमंत्री छात्रों के सवाल लेते हैं और परीक्षा से जुड़े अनुभवों, पढ़ाई, तनाव, डिजिटल डिस्ट्रैक्शन और जीवनशैली जैसे विषयों पर बातचीत करते हैं। इस वजह से इसका फोकस राजनीतिक मुद्दों के बजाय विद्यार्थियों की रोजमर्रा की चुनौतियों पर रहता है।

    महिलाओं से जुड़ी भाषा और योजनाओं का संवाद
    महिलाओं के संदर्भ में प्रधानमंत्री के सार्वजनिक संबोधनों में ‘माताओं-बहनों-बेटियों’ जैसे संबोधन अक्सर दिखाई देते हैं। महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर उनके भाषणों में उज्ज्वला योजना, लखपति दीदी और ड्रोन दीदी जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख भी प्रमुखता से होता रहा है।

    इन योजनाओं के जरिए सरकारी संवाद में महिलाओं को घरेलू जरूरतों के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों, स्वयं सहायता समूहों और आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया गया है। महिलाओं के लिए योजनाओं का प्रचार-प्रसार करते समय स्थानीय उदाहरणों और लाभार्थियों की कहानियों का इस्तेमाल भी इस संवाद शैली का हिस्सा रहा है।

    बुजुर्गों और परिवारों तक ‘मन की बात’
    सोशल मीडिया की तेज रफ्तार के साथ प्रधानमंत्री ने रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम को भी संवाद के लिए इस्तेमाल किया। ‘मन की बात’ के जरिए वे हर महीने देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ी कहानियों, स्थानीय नवाचारों, सामाजिक पहलों और गुमनाम लोगों के योगदान का उल्लेख करते हैं।

    यह प्रारूप राजनीतिक भाषण की बजाय व्यक्तिगत अनुभवों और स्थानीय उपलब्धियों पर केंद्रित रहता है। गांवों, छोटे शहरों और परिवारों तक रेडियो के जरिए पहुंच बनाने की कोशिश इसी संचार मॉडल का हिस्सा रही है।

    स्थानीय भाषा और संस्कृति को भी संवाद का माध्यम बनाया
    किसी राज्य में कार्यक्रम के दौरान वहां की भाषा, त्योहार, परंपरा, स्थानीय व्यक्तित्व या खान-पान का उल्लेख प्रधानमंत्री के भाषणों में अक्सर देखने को मिलता है। इसका उद्देश्य स्थानीय संदर्भ को राष्ट्रीय संवाद से जोड़ना होता है।

    धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों से जुड़े कार्यक्रमों तथा योग दिवस जैसे आयोजनों में भी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख उनके सार्वजनिक संबोधनों का हिस्सा रहा है। काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों से जुड़े कार्यक्रमों में भी यही शैली दिखाई देती है।

    आंकड़ों के बजाय कहानियों से बात रखने की शैली
    प्रधानमंत्री के भाषणों में आंकड़ों और सरकारी योजनाओं के साथ छोटी-छोटी कहानियों और व्यक्तिगत अनुभवों का इस्तेमाल भी अक्सर होता है। ‘मित्रों’, ‘भाइयों-बहनों’ और बाद के वर्षों में ‘मेरे परिवारजनों’ जैसे संबोधन इसी शैली का हिस्सा रहे हैं।

    विभिन्न राज्यों में भाषण की शुरुआत स्थानीय भाषा या स्थानीय संदर्भ से करना भी उनकी सार्वजनिक संवाद शैली में दिखाई देता है। इस तरह उनका कम्युनिकेशन एक ही प्रारूप तक सीमित नहीं रहता—युवाओं के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट, छात्रों के लिए संवादात्मक कार्यक्रम, महिलाओं के लिए योजनाओं और लाभार्थियों की कहानियां और परिवारों-बुजुर्गों के लिए रेडियो जैसे अलग-अलग माध्यमों का इस्तेमाल इसके अलग-अलग हिस्से हैं।

    यही बहुस्तरीय संवाद शैली नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संचार की एक प्रमुख विशेषता के रूप में देखी जाती है, जिसमें माध्यम, भाषा और विषय श्रोता वर्ग के अनुसार बदलते रहते हैं।

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