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होलिका दहन 2026 चंद्र ग्रहण के साये में किन महिलाओं के लिए वर्जित है जलती होली

February 27, 2026

नई दिल्ली। फाल्गुन पूर्णिमा की रात बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में होलिका दहन किया जाता है। यह परंपरा प्रह्लाद (Prahlada) और हिरण्यकश्यप (Hiranyakashipu) की कथा से जुड़ी है, जहां अग्नि में बैठने के बाद भी प्रह्लाद सुरक्षित रहे और अहंकार का अंत हुआ।साल 2026 में होलिका दहन को लेकर विशेष चर्चा है क्योंकि इसी दिन चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) का संयोग बन रहा है। तिथि (Date) को लेकर असमंजस (Confusion) के साथ-साथ यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि आखिर किन लोगों को जलती हुई होली (Holika Bonfire) नहीं देखनी चाहिए।

आमतौर पर यह मान्यता प्रचलित है कि नवविवाहिता को होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। माना जाता है कि विवाह के बाद जीवन का नया चरण शुरू होता है और ऐसे में तीव्र अग्नि तथा ग्रहण के संयोग को देखना शुभ नहीं माना जाता। लेकिन केवल दुल्हन ही नहीं कुछ अन्य महिलाओं और बच्चों के लिए भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

सबसे पहले गर्भवती महिलाओं की बात करें तो परंपराओं में उन्हें होलिका दहन से दूर रहने की सलाह दी जाती है। अग्नि की तेज लपटें और धुआं स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ठीक नहीं माने जाते। धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि यह अग्नि उस प्रसंग से जुड़ी है जिसमें भक्त प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया गया था इसलिए गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्हें न तो होलिका दहन देखना चाहिए और न ही उसकी परिक्रमा करनी चाहिए।

नवजात शिशुओं को भी इस रात बाहर ले जाने से बचने की परंपरा है। लोकमान्यता के अनुसार होलिका दहन की रात वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय रहती है। ऐसे में छोटे बच्चे को बुरी नजर या संक्रमण का खतरा माना जाता है। आधुनिक दृष्टि से देखें तो धुएं और भीड़भाड़ से भी शिशु को दूर रखना बेहतर होता है।

कुछ क्षेत्रों में सास और बहू को एक साथ खड़े होकर होलिका दहन देखने से मना किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है और घर में कलह का वातावरण बन सकता है। हालांकि यह पूरी तरह लोकविश्वास पर आधारित है लेकिन कई परिवार आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं।

ऐसी मां जिनकी केवल एक ही संतान है उन्हें भी होलिका दहन देखने से बचने की सलाह दी जाती है। इसका संबंध भक्त प्रह्लाद की कथा से जोड़ा जाता है जिन्हें अपने माता पिता की इकलौती संतान माना जाता है। इस कारण प्रतीकात्मक रूप से ऐसी माताएं इस अग्नि से दूरी बनाए रखती हैं।

जिस लड़की का विवाह तय हो चुका हो और जो शीघ्र ही नए जीवन की शुरुआत करने वाली हो उसे भी जलती हुई होली देखने से मना किया जाता है। मान्यता है कि जीवन के नए चरण में प्रवेश से पहले किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से दूरी बनाए रखना शुभ होता है।

  • ध्यान रहे कि ये सभी बातें पारंपरिक मान्यताओं और लोकविश्वास पर आधारित हैं। आस्था के साथ साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है ताकि होली का पर्व आनंद और सकारात्मकता के साथ मनाया जा सके।

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