नई दिल्ली। कभी अपनी अपार समृद्धि के कारण दुनिया में ‘सोने की चिड़िया’ (Golden Bird) के नाम से प्रसिद्ध भारत में एक बार फिर सोने को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में देश की पहली बड़ी निजी सोने की खदान (Gold mine) शुरू होने के साथ ही यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत अब सोने के उत्पादन में नई छलांग लगाने जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे भारत की सोने पर आयात निर्भरता तुरंत खत्म नहीं होने वाली।
आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के जोन्नागिरी गांव, जिसका नाम अब ‘स्वर्णगिरी’ रखा गया है, में करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से देश की पहली बड़ी निजी गोल्ड माइन विकसित की गई है। इस परियोजना में ओपन-पिट तकनीक के जरिए खनन होगा, यानी जमीन के भीतर लंबी सुरंगें बनाने के बजाय खुले गड्ढों से सोना निकाला जाएगा।
प्रारंभिक सर्वेक्षण में यहां 13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि हुई है। आगे की खोजबीन में यह भंडार 42 टन तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। हालांकि पूरा सोना एक साथ नहीं निकलेगा। पहले वर्ष लगभग 400 किलोग्राम उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जबकि भविष्य में यह बढ़कर 900 किलोग्राम से 1 टन प्रतिवर्ष तक पहुंच सकता है। अनुमान है कि यह परियोजना करीब 15 वर्षों तक संचालित रहेगी।
भारत में सोना कोई नई चीज नहीं है। प्राचीन काल से ही देश सोने की संपन्नता के लिए जाना जाता रहा है। आधुनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर सोने का खनन ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ था। कर्नाटक की प्रसिद्ध कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) में 1880 के आसपास आधुनिक खनन गतिविधियां शुरू हुईं।
करीब 3.2 किलोमीटर गहराई तक पहुंचने वाली यह खदान दुनिया की सबसे गहरी खदानों में गिनी जाती थी। लगभग 120 वर्षों तक संचालित रही इस खदान से 800 से 900 टन तक सोना निकाला गया। एक समय ऐसा भी था जब भारत में उत्पादित कुल सोने का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अकेले केजीएफ से आता था।
साल 1956 में KGF का राष्ट्रीयकरण कर इसका संचालन भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड (BGML) को सौंपा गया। लेकिन समय के साथ उत्पादन घटता गया और खनन की लागत बढ़ती चली गई। अंततः आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बनने के कारण वर्ष 2001 में इस ऐतिहासिक खदान को बंद करना पड़ा।
फिलहाल कर्नाटक के रायचूर जिले में स्थित हुत्ती गोल्ड माइन्स भारत की प्रमुख सक्रिय सोने की खदान है, जहां से प्रतिवर्ष लगभग 1 से 1.5 टन सोना निकाला जाता है। इसके अलावा कुछ छोटे क्षेत्रों में भी खनन होता है, लेकिन उत्पादन सीमित है।
इसके विपरीत भारत हर साल लगभग 700 से 800 टन सोना आयात करता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन देश की कुल मांग का बेहद छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है।
वैश्विक स्तर पर चीन सोने के उत्पादन में सबसे आगे है, जहां हर वर्ष करीब 370 से 380 टन सोना निकाला जाता है। इसके बाद रूस लगभग 325 टन, ऑस्ट्रेलिया 280 से 290 टन और कनाडा करीब 200 टन वार्षिक उत्पादन करते हैं। अमेरिका, घाना, पेरू और मेक्सिको भी प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल हैं।
एक समय दक्षिण अफ्रीका सोने के उत्पादन का वैश्विक केंद्र था और वहां से सालाना लगभग 1,000 टन तक सोना निकलता था। हालांकि वर्तमान में उसका उत्पादन घटकर करीब 100 टन के आसपास रह गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आंध्र प्रदेश की नई खदान से हर साल 1 टन सोना भी निकलता है, तब भी भारत की कुल मांग के मुकाबले इसका प्रभाव सीमित रहेगा। पिछले वर्ष भारत ने लगभग 7,200 करोड़ डॉलर मूल्य का सोना आयात किया था। ऐसे में एक अकेली खदान आयात निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं कर सकती।
फिर भी इसे एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा रहा है। यदि यह परियोजना सफल रहती है और निजी क्षेत्र को लाभ मिलता है, तो ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी नई खोज और निवेश को बढ़ावा मिल सकता है।
सोने और तांबे के विशाल भंडार वाली पाकिस्तान की रेको डीक परियोजना भी चर्चा में है। बलूचिस्तान स्थित इस खदान में लगभग 1,270 टन सोने के भंडार का अनुमान लगाया गया है। योजना के अनुसार 2028 से उत्पादन शुरू होने की संभावना है और शुरुआती चरण में प्रतिवर्ष 7 से 8 टन सोना निकाला जा सकता है। हालांकि क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां इस परियोजना के सामने बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
आंध्र प्रदेश की यह परियोजना फिलहाल भारत को सोने के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बनाएगी, लेकिन यह निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ खनन उद्योग के नए दौर की शुरुआत जरूर मानी जा रही है। यदि भविष्य में नई खोजें सफल होती हैं, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ता है और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए खनन किया जाता है, तो भारत अपने घरेलू सोना उत्पादन को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। इसी वजह से स्वर्णगिरी की यह खदान केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि भारत के खनन क्षेत्र की नई संभावनाओं का प्रतीक बनकर उभरी है।
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