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ऋषिकेश मुखर्जी ने आम जिंदगी की कहानियों को दिया खास अंदाज, अभिमान से आनंद तक यादगार फिल्मों ने बनाई अलग पहचान

September 30, 2026

नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) के इतिहास में ऋषिकेश मुखर्जी (Hrishikesh Mukherjee) ऐसे फिल्मकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने बड़े बजट और भव्य सेट के बजाय आम इंसान की जिंदगी को अपनी कहानियों का केंद्र बनाया। दर्शकों के बीच प्यार से ऋषि दा के नाम से पहचाने जाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी ने रोजमर्रा की जिंदगी के सामान्य पलों को भावनाओं (Emotions) और रिश्तों (Relationships) से जोड़कर पर्दे पर पेश किया। उनकी फिल्मों में परिवार के भीतर की खटास और मिठास, रिश्तों की उलझन, दोस्ती का अपनापन और जिंदगी तथा मौत के बीच के सवाल सहज अंदाज में दिखाई देते थे। उनकी कहानियों (Stories) में किरदार और उनकी परेशानियां आम परिवारों से जुड़े लगते थे, लेकिन कहानी कहने का तरीका दर्शकों को उनसे भावनात्मक रूप (Emotional Connection) से जोड़ देता था। यही सादगी उनके सिनेमा की सबसे बड़ी विशेषताओं (Features) में शामिल रही।

1973 में आई अभिमान ऋषिकेश मुखर्जी के इसी संवेदनशील सिनेमा का प्रमुख उदाहरण है। अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फिल्म में पति-पत्नी के रिश्ते के भीतर आने वाले अहंकार और असुरक्षा को प्रभावी ढंग से सामने रखा गया। फिल्म ने यह दिखाया कि किसी रिश्ते को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल प्यार ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की सफलता और भावनाओं को समझना भी जरूरी होता है। इससे पहले 1971 में रिलीज हुई आनंद के जरिए ऋषिकेश मुखर्जी ने जिंदगी से जुड़े गहरे सवाल को बेहद सरल भाषा में सामने रखा था। फिल्म में राजेश खन्ना ने आनंद और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर की भूमिका निभाई। कहानी ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द है जो अपनी जिंदगी के सीमित समय के बावजूद अपने आसपास के लोगों में खुशियां बांटने की कोशिश करता है। आनंद का किरदार जिंदगी की लंबाई के बजाय उसे जीने के तरीके को महत्वपूर्ण मानने की सोच सामने रखता है।

ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा में हास्य का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा, लेकिन उनकी कॉमेडी केवल दर्शकों को हंसाने तक सीमित नहीं थी। गोल माल इसका प्रमुख उदाहरण है। अमोल पालेकर और उत्पल दत्त के शानदार अभिनय से सजी इस फिल्म में सहज कहानी और यादगार किरदारों के जरिए सामाजिक सोच तथा बनावटीपन पर हल्का व्यंग्य किया गया। फिल्म का हास्य आज भी दर्शकों को आकर्षित करता है। चुपके चुपके में भी उन्होंने रिश्तों और हास्य को साथ लेकर कहानी बुनी। धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टैगोर और जया बच्चन जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म में भाषा, पहचान और पारिवारिक माहौल के बीच पैदा होने वाली मजेदार परिस्थितियों को सामने रखा गया। कहानी में हास्य के साथ अपनापन लगातार बना रहा, जो इसकी खासियत रही।

बावर्ची और सत्यकाम में भी ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। बावर्ची में परिवार के भीतर छोटी-छोटी बातों और आपसी दूरियों को सरलता के साथ सामने रखा गया, जबकि सत्यकाम में आदर्श और ईमानदारी जैसे मूल्यों को गंभीर सवालों के साथ प्रस्तुत किया गया। उनकी फिल्मों में अक्सर यह विचार दिखाई देता रहा कि इंसान की वास्तविक पहचान उसके पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और रिश्तों से होती है। इसी वजह से उनकी कहानियां आम जिंदगी से जुड़ी होने के बावजूद दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती रहीं।


  • ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की खासियत यह रही कि उन्होंने मनोरंजन के साथ दर्शकों को उनकी अपनी जिंदगी से जुड़े रिश्तों और भावनाओं से भी रूबरू कराया। अभिमान ने पति-पत्नी के रिश्ते में समझ और भावनाओं की अहमियत को सामने रखा, आनंद ने जिंदगी को देखने का एक अलग नजरिया पेश किया, जबकि गोल माल और चुपके चुपके ने सहज हास्य के जरिए दिल तक पहुंचने वाली कहानियां दीं। बावर्ची और सत्यकाम ने भी परिवार, व्यवहार, आदर्श और ईमानदारी जैसे विषयों को अपनी-अपनी शैली में प्रस्तुत किया। आम इंसान की जिंदगी को सादगी और संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारने की यही शैली ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा की पहचान बनी और उनकी फिल्मों को लंबे समय तक यादगार बनाए रखा।

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