
नागदा। मध्यप्रदेश में 31 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन और केंद्र से 7,665 मेगावॉट बिजली मिल रही कुल 38 हजार मेगावॉट से अधिक बिजली के बाद भी किसानों, ग्रामीणों, घरेलू उपभोक्ताओं और उद्योगों को अघोषित बिजली कटौती का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
उक्त आरोप लगाते हुए पूर्व विधायक दिलीप सिंह गुर्जर ने कहा कि भाजपा विधायक डॉ. तेजबहादुर सिंह चौहान द्वारा दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री काल में बिजली उत्पादन पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उन्हें मप्र के इतिहास और परिस्थितियों का भी अध्ययन करना चाहिए। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद अविभाजित मप्र के कई प्रमुख कोयला संसाधन और बड़े ताप बिजली संयंत्र छत्तीसगढ़ में चले गए, जबकि बिजली की माँग का बड़ा हिस्सा वर्तमान मध्यप्रदेश में ही रहा। इस बदलाव ने प्रदेश की बिजली व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कीं। बावजूद दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने वाली परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया। संजय गांधी ताप बिजली गृह, बिरसिंहपुर की इकाइयों के विस्तार, इंदिरा सागर और बाणसागर जैसी जल बिजली परियोजनाओं ने प्रदेश की बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया। भाजपा उन्हीं ऐतिहासिक प्रयासों और बाद में विकसित हुई बिजली क्षमता का श्रेय लेने में लगी है। केवल इन आंकड़ों को जोड़कर जनता को गुमराह नहीं किया जा सकता।