
नई दिल्ली । दक्षिण-पूर्व एशिया(Southeast Asia) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इंडोनेशिया(Indonesia) ने भारत की ऑटो इंडस्ट्री (India’s auto industry)को बड़ा झटका दिया है। स्थानीय व्यापारिक संगठनों और नीति निर्माताओं के तीखे विरोध के बाद इंडोनेशिया सरकार ने भारतीय वाहन निर्माताओं टाटा मोटर्स (Tata Motors) और महिंद्रा एंड महिंद्रा ( Mahindra & Mahindra ) से 1,05,000 ट्रकों की खरीद के मेगा ऑर्डर पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह डील दोनों कंपनियों के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही थी।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऑर्डर के तहत महिंद्रा को 35,000 ‘स्कॉर्पियो पिक-अप’ वाहन सप्लाई करने थे। कंपनी के अनुसार यह उसका अब तक का सबसे बड़ा निर्यात ऑर्डर होता। वहीं टाटा मोटर्स की स्थानीय इकाई को 35,000 ‘योद्धा’ पिक-अप और 35,000 ‘अल्ट्रा T.7’ ट्रकों की आपूर्ति करनी थी। इंडोनेशिया के लिए यह टाटा का सबसे बड़ा ऑर्डर माना जा रहा था। हालांकि इस फैसले पर दोनों कंपनियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
यह पूरा प्रोजेक्ट इंडोनेशिया के राष्ट्रपति Prabowo Subianto की महत्वाकांक्षी योजना से जुड़ा है। सरकार देशभर में 80,000 से अधिक सामुदायिक सहकारी समितियां स्थापित करना चाहती है। इन 4×4 और 6-पहिया ट्रकों का उपयोग ग्रामीण इलाकों में कोल्ड स्टोरेज, सब्सिडी वाली खाद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के लिए किया जाना था। साथ ही ये समितियां लोन सेवाएं भी देतीं, जिससे सरकार सीधे ग्रामीण आबादी तक अपनी पहुंच मजबूत कर सके।
लेकिन जकार्ता में इस आयात के खिलाफ जोरदार विरोध हुआ। इंडोनेशिया में पहले से टोयोटा, सुजुकी और मित्सुबिशी जैसी कंपनियों की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स मौजूद हैं। कमजोर घरेलू मांग और घटती कार बिक्री के कारण स्थानीय ऑटो सेक्टर दबाव में है। पिछले वर्ष वहां कारों की बिक्री 7.2% घटकर 8,03,687 यूनिट रह गई। ऐसे में बाहर से बड़े पैमाने पर ट्रक आयात करने के फैसले को उद्योग संगठनों ने ‘मेक इन इंडोनेशिया’ नीति के खिलाफ बताया।
इंडोनेशिया के उद्योग मंत्री अगुस गुमीवांग कर्तासस्मिता ने कहा कि देश में सालाना लगभग 10 लाख पिक-अप ट्रक बनाने की क्षमता है। उनके अनुसार, अगर 70,000 पिक-अप ट्रक स्थानीय स्तर पर बनाए जाते तो अर्थव्यवस्था को करीब 27 ट्रिलियन रुपिया (लगभग 1.6 अरब डॉलर) का लाभ होता और हजारों नई नौकरियां पैदा होतीं।
यह खरीद सरकारी कंपनी PT Agrinas Pangan Nusantara द्वारा की जानी थी, जिसे खाद्य आत्मनिर्भरता और कृषि परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में बनाया गया है। फिलहाल सरकार और सांसदों के बीच अहम बैठक तक इस ऑर्डर को होल्ड पर रखा गया है।
अब देखना होगा कि इंडोनेशिया सरकार स्थानीय निर्माण को प्राथमिकता देती है या भारत के साथ इस बड़े व्यापारिक समझौते को आगे बढ़ाती है। यह फैसला दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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