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इंदौर : भागीरथपुरा में पहली बार फीकी मकर संक्रांति, उल्लास की जगह शोक व सन्नाटा

January 14, 2026

मानसिक प्रबंधन के लिए छात्रों को लेनी पड़ रही मदद, कइयों से मजदूरी तक छिनी

इंदौर। जहां कभी मकर संक्रांति (Makar Sankranti ) से एक सप्ताह पहले ही गलियों में तिल के लड्डू (Sesame ladoos) और गुड़पट्टी की खुशबू फैल जाया करती थी, जहां फेरीवाले लड्ड ले लो गुड़पट्टी ले लो की आवाज लगाते थे, आज वहीं भगीरथपुरा (Bhagirathpura) की गलियां खामोश हैं। इस बार मकर संक्रांति पर न पतंगों की रंगीन छटा दिखी, न बच्चों की किलकारियां सुनाई दीं। पूरे इलाके में शोक और चिंता का साया पसरा है।

बीते दिनों भगीरथपुरा में फैली गंभीर बीमारी और उससे हुई मौतों ने पूरे मोहल्लों की रौनक छीन ली है। हालात ऐसे रहे कि जहां पहले फेरी लगती थी, वहीं अब स्वास्थ्यकर्मी घर-घर दस्तक देते नजर आ रहे हैं। क्षेत्र के 23 घरों में आज भी दुख का माहौल है। कई परिवारों के परिजन अस्पतालों में वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, तो कई घरों में देवी-देवताओं के सामने दीप जलाकर सिर्फ एक ही प्रार्थना की जा रही है कि हमारे अपने बच जाएं, वहीं जो बच्चे बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, वह अब मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। मकर संक्रांति पर भागीरथपुरा में हमेशा सामूहिक उत्सव और पतंगबाजी का माहौल नजर आता था, वह इस बार पूरी तरह फीकी पड़ गई है। खाली मैदान आसमान को रंग- बिरंगी पतंगों से भर देते थे तो गलियों में तिल-गुड़ की खुशबू फैला करती थी, वहां बच्चों और युवाओं ने खुद ही पतंगबाजी से दूरी बना ली है। अपनों को खोने के गम में गलियां आज भी सिसक रही हैं। लोग कहते हैं कि हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं, लेकिन जिन्होंने अपने परिवार के सदस्य खोए हैं, उनके दिलों में कसक आज भी बाकी है।


  • बच्चे गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं
    इस त्रासदी का असर केवल त्योहार तक सीमित नहीं रहा। कई घरों में बच्चे स्कूल नहीं जा पाए। रोज कुआं खोदकर प्यास बुझाने वाली कहावत यहां मजदूर परिवारों पर सटीक बैठती है। बीमारी और शोक के कारण कई लोग मजदूरी पर नहीं जा सके, जिससे आर्थिक संकट और गहराता चला गया। त्योहार के समय जो घर खुशियों से भर जाते थे, वे इस बार चिंता और खालीपन से घिरे नजर आए। सबसे ज्यादा असर बच्चों और छात्रों पर पड़ा है। कक्षा 10वीं में पढऩे वाले अभय वर्मा की मां सुनीता वर्मा का हाल ही में निधन हो गया। मां को खोने के बाद अभय का पढ़ाई से मन उचट गया है। उसकी आंखों में किताबों की जगह अब मां की यादें तैरती रहती हैं। अभय अकेला नहीं है— ऐसे कई 10वीं और 12वीं के छात्र हैं, जिनके सिर पर पहले प्री-बोर्ड और फिर 4 फरवरी से शुरू होने वाली बोर्ड परीक्षाओं का दबाव है। घर में शोक, बाहर अनिश्चितता और भीतर भविष्य की चिंता इन सबके बीच ये बच्चे गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।

    स्वास्थ्य विभाग लगा रहा कैंप
    मानसिक परेशानियों से रहवासियों को बचाने और अवसाद से उभरने के लिए स्वास्थ्य विभाग क्षेत्र के रहवासियों की मदद के लिए जमीनी स्तर पर उतर गया है। सामुदायिक भवन क्षेत्र में मानसिक रोग विशेषज्ञ जांच के साथ-साथ काउंसलिंग भी कर रहे हैं। मोहल्ले के बुजुर्गों का कहना है कि भागीरथपुरा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब मकर संक्रांति पर न लड्डू बने, न छतों पर पतंगें दिखीं। त्योहार तो आ गया, लेकिन उत्सव का मन नहीं आया। इस बार मकर संक्रांति ने भागीरथपुरा को यह एहसास कराया कि खुशियों के रंग तभी खिलते हैं, जब अपनों का साथ सलामत हो।

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