
नई दिल्ली । जावेद अख्तर (Javed Akhtar) ने भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) में अपनी अलग पहचान बनाने से पहले बेहद कठिन दौर का सामना किया था। 4 अक्टूबर 1964 को महज 19 साल की उम्र में वह मुंबई (Mumbai) के बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन (Bombay Central Station) पहुंचे थे। उस समय उनकी जेब में केवल 27 पैसे थे, लेकिन वह बड़े सपने लेकर शहर आए थे। मुंबई (Mumbai)में अपनी पहचान बनाने की कोशिश के दौरान उनके सामने रहने और खाने तक की गंभीर मुश्किलें आईं।
शबाना आजमी ने जावेद अख्तर के संघर्ष के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उनके पास मुंबई में रहने के लिए कोई निश्चित जगह नहीं थी। कई बार उन्हें फुटपाथ पर रात गुजारनी पड़ी। कुछ मौकों पर उन्होंने रेलवे स्टेशन और अलग-अलग स्टूडियो के परिसर में भी रात बिताई। शुरुआती दौर में उनके पास जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं थे।
शबाना के मुताबिक, जावेद अख्तर के संघर्ष का दौर इतना कठिन था कि एक समय उन्हें लगातार तीन दिनों तक खाना नहीं मिला। उनके पास पहनने के लिए भी ज्यादा कपड़े नहीं थे और जो कपड़े थे, उनकी हालत भी खराब थी। ऐसी परिस्थितियों के बीच मुंबई में टिके रहना उनके लिए आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी।
शबाना आजमी ने बताया कि जब जावेद अख्तर पूरी तरह निराशा के करीब पहुंच गए थे और उनके सामने हार मान लेने का विकल्प था, तब उन्होंने खुद को संभाला। उन्होंने खुद से कहा कि वह इस तरह मरने के लिए पैदा नहीं हुए हैं और एक दिन यह मुश्किल समय जरूर बदलेगा। समय के साथ उनकी यह सोच सच साबित हुई और उन्होंने अपने काम के जरिए भारतीय सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी बाद में सलीम-जावेद के नाम से प्रसिद्ध हुई। 1970 और 1980 के दशक में इस जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को जंजीर, दीवार, शोले और डॉन जैसी चर्चित फिल्में दीं। इन फिल्मों की सफलता में उनकी लेखनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके बाद जावेद अख्तर ने गीतकार और शायर के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई और हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए।
शबाना आजमी ने जावेद अख्तर के शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए लोगों से मुश्किल परिस्थितियों में हार न मानने की अपील की। उन्होंने कहा कि कुछ सफर लगभग कुछ भी न होने से शुरू होते हैं और उनके साथ केवल एक सपना होता है। उनके मुताबिक, अगर जावेद अख्तर अपने हालात बदल सकते हैं तो कोई भी ऐसा कर सकता है। जावेद अख्तर और शबाना आजमी ने 9 दिसंबर 1984 को शादी की थी।
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