
लंदन। भारत के प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice of India) (सीजेआई) सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने कहा है कि ऐसा न्यायालय जो केवल उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है जो मुकदमेबाजी का खर्च उठाने में सक्षम हैं, वह अपने संवैधानिक कार्य को पूरा नहीं कर रहा है, बल्कि केवल उसकी औपचारिकता निभा रहा है। सीजेआई ने कहाकि न्यायपालिका (Judiciary) को न केवल अधिकारों का संरक्षक होना चाहिए, बल्कि यह इतनी सुलभ होनी चाहिए कि उसका संरक्षण वास्तविक रूप से महसूस हो। जस्टिस सूर्यकांत शुक्रवार को ‘क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन’ (Queen Mary University of London) में वाणिज्यिक विधि केंद्र द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने गये थे। उन्होंने छात्रों के साथ व्यापक चर्चा की और छात्रों ने उनसे न्यायपालिका, न्याय तक पहुंच और कानूनी पेशे के भविष्य समेत विभिन्न मुद्दों पर कई सवाल पूछे।
समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति पर जोर
संवैधानिक लोकतंत्र में जनता के भरोसे को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में पूछे गये एक सवाल के जवाब में, जस्टिस सूर्यकांत ने कहाकि जनता का भरोसा किसी संस्था को यूं ही नहीं मिल जाता, बल्कि इसे पारदर्शिता, निरंतरता और आत्म-सुधार के जरिए लगातार हासिल करना पड़ता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की अंतिम कड़ी है, लेकिन उसे स्वयं संविधान और उनलोगों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, जिनके लिए यह अस्तित्व में है। उन्होंने कहाकि इसीलिए मैंने एक समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति पर जोर दिया है। जब अदालतों के फैसले सुसंगत होते हैं, तो लोगों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ता है। इससे नागरिकों को यह समझने में आसानी होती है कि कानून कैसे लागू होगा और वे उसी के अनुसार अपने निर्णय ले सकते हैं। यही कानून के शासन का मूल सिद्धांत है।
केवल कागज पर लिखे शब्द न हों
आधुनिक लोकतंत्र में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में पूछे जाने पर, जस्टिस सूर्यकांत ने कहाकि न्यायपालिका का सर्वोपरि कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि संविधान में निहित सिद्धांत केवल कागज पर लिखे शब्द न हों, बल्कि इस बात की गारंटी बने जो प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करें। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है, विशेष रूप से उन लोगों की, जो हाशिए पर हैं, ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के अत्याचार या उनके अधिकारों के हनन से बचाया जा सके।
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टेक्नोलॉजी पर भी बात
अदालतों के भविष्य और न्याय तक पहुंच को टेक्नोलॉजी किस तरह से बदल रही है, इस बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए, सीजेआई ने कहाकि टेक्नोलॉजी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान न्याय तक पहुंच का विस्तार करने में रहा है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहाकि न्यायपालिका के समक्ष चुनौती यह है कि वह निष्पक्षता, सुलभता और सभी के लिए समान न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए नवाचार को अपनाए। प्रधान न्यायाधीश ने कहाकि मुवक्किलों को अदालत से इस वास्तविक अहसास के साथ निकलते देखना कि उनकी बात सुनी गई है और न्याय हुआ है, उनके लिए न्यायाधीश होने का सबसे संतोषजनक पहलू है।
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