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कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, अब किसान उगा सकेंगे 40 हजार रुपये किलो वाला दुर्लभ मशरूम

April 10, 2026

नई दिल्ली। कश्मीर (Kashmir) के वैज्ञानिकों (Scientists) ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिससे अब किसान (Farmer) बेहद महंगा और दुर्लभ मशरूम (Mushroom) अपने खेतों में उगा सकेंगे। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एसकास्ट) के वैज्ञानिकों ने पहली बार नियंत्रित वातावरण में इस उच्च मूल्य वाले मशरूम की सफल खेती कर दिखायी है।

जंगलों में मिलने वाला दुर्लभ ‘मोरल्स’ अब खेती में संभव
यह मशरूम ‘मोरल्स’ या ‘मोरचेला’ के नाम से जाना जाता है, जिसे स्थानीय रूप से कंगाच कहा जाता है। यह आमतौर पर ऊंचाई वाले जंगलों में खास मौसम में प्राकृतिक रूप से उगता है। बाजार में इसकी कीमत 15 हजार से 40 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंचती है। स्वाद, पोषण और औषधीय गुणों के कारण इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग भी काफी अधिक है।

वैज्ञानिकों की टीम ने कैसे किया शोध
एसकास्ट के कुलपति प्रोफेसर नजीर अहमद गनई के अनुसार यह खोज कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस शोध में पांच वर्षों तक काम किया गया। 1000 से अधिक जंगली स्थानों से मोरचेला के नमूने इकट्ठा कर मिट्टी, मौसम और पर्यावरण का गहराई से अध्ययन किया गया।

टीम ने 10 किस्मों का चयन किया, जिनमें से 3 किस्मों को नियंत्रित वातावरण में सफलतापूर्वक उगाया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि आगे अन्य किस्मों पर भी सफलता मिलने की संभावना है।


  • पॉलीहाउस और खुले वातावरण दोनों में सफलता
    इस परियोजना में कुछ किस्मों को पॉलीहाउस में उगाया गया, जबकि कुछ को खुले वातावरण में भी सफलतापूर्वक विकसित किया गया। वैज्ञानिकों ने इसके लिए पेटेंट के लिए आवेदन भी किया है और इसे घाटी के अलग-अलग जिलों बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर में परीक्षण के तौर पर उगाया गया है।

    खेती की जटिल प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने समझा
    शोधकर्ताओं के अनुसार मोरचेला की खेती बेहद जटिल होती है क्योंकि इसे विशेष नमी, तापमान और पर्यावरणीय संतुलन की जरूरत होती है। अलग-अलग किस्मों के लिए अलग पौधों और मिट्टी की संरचना का भी ध्यान रखना पड़ता है। वैज्ञानिकों ने लंबे अध्ययन के बाद इन सभी परिस्थितियों को नियंत्रित तरीके से तैयार किया।

    किसानों की आय बढ़ाने की उम्मीद
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से जम्मू-कश्मीर में कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी भारी मांग को देखते हुए किसानों की आय कई गुना बढ़ने की संभावना है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज क्षेत्र की जैव-अर्थव्यवस्था और रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकती है।

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