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महाराष्ट्र: मरठवाड़ा में 5 साल में 5000 से किसानों ने की खुदकुशी, हर दिन 3 किसान ले रहे अपनी जान

January 15, 2026

मुम्बई। महाराष्ट्र (Maharashtra) के सूखाग्रस्त क्षेत्र (Drought-affected areas) के रूप में पहचाने जाने वाले मराठवाड़ा क्षेत्र (Marathwada region) में किसानों की हालत लगातार गंभीर बनी हुई है। एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पाँच सालों में 5,000 से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी कर ली है। हैरत की बात ये है कि 2025 में सबसे ज़्यादा आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं। डिविजनल कमिश्नर कार्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में कुल 1,129 किसानों ने आत्महत्या की है, जो एक साल पहले 948 थी, जबकि 2021 से अब तक कुल पांच वर्षों में कुल 5,075 आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वहां हर दिन औसतन तीन किसान अपनी जीवन लीला खत्म कर रहे हैं।


  • मराठवाड़ा डिवीजन में छत्रपति संभाजीनगर, जालना, परभणी, नांदेड़, बीड, धाराशिव, हिंगोली और लातूर जिले शामिल हैं। डिवीजनल कमिश्नर कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में 887, 2022 में 1,023, 2023 में 1,088, 2024 में 948 और 2025 में 1,129 किसानों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली है। कुल मिलाकर 2021 से अब तक 5,075 किसानों की आत्महत्या हो चुकी है।

    बीड जिला सबसे ज़्यादा प्रभावित
    2025 में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज़्यादा मामले बीड जिले से सामने आए, जहां 256 किसानों ने जान दे दी। इनमें से 193 परिवारों को अनुग्रह राशि दी गई है। 2025 में जिलेवार किसानों की आत्महत्याएं इस प्रकार रही हैं: छत्रपति संभाजीनगर- 224, जालना- 90, परभणी- 104, हिंगोली- 68, नांदेड़- 170, बीड- 256, लातूर- 76 और धाराशिव-141।

    बारिश और बाढ़ बनी बड़ी वजह
    अधिकारियों के अनुसार, पिछले साल मराठवाड़ा के कई हिस्सों में असमय बारिश हुई। मई महीने में कुछ इलाकों में 125 से 150 प्रतिशत तक अधिक वर्षा दर्ज की गई। इसके अलावा सितंबर–अक्टूबर 2025 में आई बाढ़ ने क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में हुई कुल आत्महत्याओं में से 537 मौतें मई से अक्टूबर के बीच हुईं, जब बारिश और प्राकृतिक आपदाओं ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं।

    चिंता का विषय
    लगातार खराब मौसम, फसल नुकसान, बढ़ता कर्ज़ और आर्थिक दबाव मराठवाड़ा के किसानों को गहरे संकट में धकेल रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हालात से निपटने के लिए स्थायी और प्रभावी नीतियों की ज़रूरत है, ताकि किसानों को राहत मिल सके।

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