
नई दिल्ली ।कार्तिक अमावस्या (Kartik Amavasya) और दीपावली (Diwali) का पर्व भगवान श्रीराम (Lord Rama) के अयोध्या लौटने की कथा से तो जुड़ा ही है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की एक विशेष लीला भी इस समय को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने माता यशोदा (Mother Yashoda) के प्रेम और वात्सल्य के आगे स्वयं को समर्पित कर दिया था। यह प्रसंग दामोदर लीला के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें संसार के पालनहार और संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को माता यशोदा ने एक साधारण रस्सी से ओखल के साथ बांध दिया था। इसी लीला के स्मरण में कार्तिक मास के दौरान भगवान के दामोदर स्वरूप की पूजा और दीपदान की परंपरा निभाई जाती है।
कार्तिक मास को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और राधारानी के प्रेम के स्मरण का विशेष समय माना जाता है। इस महीने मंदिरों में भगवान के दामोदर स्वरूप की आराधना की जाती है। श्रद्धालु प्रतिदिन दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान के सामने अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान दीपदान और हरिनाम संकीर्तन का विशेष महत्व है। भक्त इस माध्यम से भगवान के प्रति प्रेम, भक्ति और समर्पण का भाव व्यक्त करते हैं।
दामोदर लीला का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, बालकृष्ण बचपन में अपनी शरारतों से माता यशोदा को परेशान करते रहते थे। एक दिन उनकी शरारतों से परेशान होकर माता यशोदा ने उन्हें बांधने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने एक रस्सी ली और उससे भगवान कृष्ण को ओखल के साथ बांधने का प्रयास किया, लेकिन हर बार रस्सी छोटी पड़ जाती थी।
माता यशोदा ने भगवान को बांधने के लिए कई रस्सियां एक-दूसरे से जोड़ दीं। इसके बावजूद हर बार रस्सी दो अंगुल कम रह जाती थी। माता लगातार प्रयास करती रहीं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। काफी देर तक कोशिश करने के बाद वह थक गईं। उनके प्रयासों में झलकता स्नेह, वात्सल्य और निष्कपट भाव देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को बंधने दिया। इसके बाद माता यशोदा उन्हें ओखल से बांधने में सफल हो गईं।
इस प्रसंग से भगवान श्रीकृष्ण का दामोदर नाम भी जुड़ा है। संस्कृत में ‘दाम’ का अर्थ रस्सी और ‘उदर’ का अर्थ पेट होता है। इसी कारण रस्सी से पेट के पास बंधे भगवान कृष्ण को दामोदर कहा गया। इस लीला को केवल बालकृष्ण की शरारत और माता की डांट तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसमें भक्ति और प्रेम का गहरा भाव भी जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान को सांसारिक शक्ति या साधनों से नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम और निष्कपट भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है।
कार्तिक मास में भगवान श्रीकृष्ण की अन्य लीलाओं का भी विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। गोपाष्टमी पर गौचारण लीला से जुड़ी परंपराओं के तहत गौमाता की पूजा होती है। गोवर्धन पूजा के अवसर पर भगवान के गिरिराज पर्वत धारण करने की लीला याद की जाती है। इस प्रसंग में भगवान ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। इसके अलावा इंद्र के अभिमान का दमन, कालिया नाग का मर्दन और ब्रज की महारास लीला भी कृष्णभक्ति की परंपरा में विशेष स्थान रखती हैं।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में हुआ था, जबकि उनके नामकरण का संबंध कार्तिक महीने से बताया जाता है। इसी महीने में उनकी बाल लीलाओं का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए कार्तिक मास में दामोदर लीला का स्मरण, भगवान के दर्शन, दीपदान और हरिनाम संकीर्तन को भक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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