
नई दिल्ली । भारत (India) में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जहां सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराएं उन्हें विशेष पहचान दिलाती हैं। केरल (Kerala) के मलप्पुरम (Malappuram) जिले में स्थित श्री अर्धनारीश्वर मंदिर (Shri Ardhanareeshwara Temple) भी अपनी एक अनोखी परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के बीच खास महत्व रखता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग (Shivling) साल के 364 दिन पानी में डूबा रहता है। भक्तों को इसके प्रत्यक्ष दर्शन करने का अवसर वर्ष में केवल एक दिन, महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर मिलता है।
मलप्पुरम जिले के अरक्कुपरम्बा क्षेत्र में स्थित यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती के संयुक्त स्वरूप अर्धनारीश्वर को समर्पित है। मंदिर पेरिनथलमन्ना से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां की धार्मिक व्यवस्था और जल से जुड़ी परंपरा इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है। मंदिर परिसर तक पहुंचने वाला रास्ता भी पानी से घिरा रहता है, जो इस स्थान की विशिष्ट पहचान का हिस्सा है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग सामान्य दिनों में जल के भीतर रहता है। सालभर पानी में डूबे रहने के कारण श्रद्धालु नियमित रूप से शिवलिंग के दर्शन नहीं कर पाते। महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर परिसर से पानी बाहर निकाला जाता है। इसके बाद जल के नीचे स्थित शिवलिंग श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए उपलब्ध होता है। इसी विशेष व्यवस्था के चलते इस दिन मंदिर में भक्तों की धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।
मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा विशेष रूप से वैवाहिक जीवन से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए भी की जाती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनाए रखने का आशीर्वाद मिलता है। मंदिर में उमा महेश्वर पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा के दौरान भक्त विवाह संबंधी परेशानियों से मुक्ति और पति-पत्नी के बीच प्रेम, सामंजस्य तथा आपसी समझ बनाए रखने की कामना करते हैं।
इसके अलावा मंदिर के धार्मिक आयोजनों में पट्टुम थालियुम समरप्पणम नामक अनुष्ठान भी शामिल है। इस परंपरा में श्रद्धालु सुखद और खुशहाल वैवाहिक जीवन की प्रार्थना करते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के संयुक्त स्वरूप की आराधना के कारण यह अनुष्ठान मंदिर की प्रमुख धार्मिक गतिविधियों में गिना जाता है।
मंदिर में सालभर अलग-अलग अवसरों पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दिसंबर या जनवरी में यहां पांच दिवसीय वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। इसकी शुरुआत ध्वजारोहण के साथ होती है, जबकि अंतिम दिन थिरु अरट्टू अनुष्ठान के साथ उत्सव का समापन होता है। इस दौरान मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक परंपराओं का आयोजन किया जाता है।
जून या जुलाई में भी मंदिर में एक विशेष धार्मिक आयोजन होता है। इस अवसर पर 1008 कलश जलाभिषेक किया जाता है। इसमें 1,008 कलशों में भरे जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है। यह अनुष्ठान मंदिर के प्रमुख वार्षिक धार्मिक आयोजनों में शामिल है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर के खुलने का समय सुबह और शाम निर्धारित है। मंदिर सुबह 6 बजे से 9:30 बजे तक और शाम 4 बजे से 7 बजे तक खुला रहता है। यहां आने वाले भक्तों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था भी उपलब्ध है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए हवाई, रेल और सड़क मार्ग का उपयोग किया जा सकता है। निकटतम हवाई संपर्क कालीकट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से मिलता है, जो मंदिर से लगभग 40 से 50 किलोमीटर दूर है। हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर मंदिर पहुंचा जा सकता है। रेल मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अंगडीपुरम रेलवे स्टेशन नजदीक है। स्टेशन से ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और बस की सुविधा मिलती है। वहीं, पेरिनथलमन्ना से स्थानीय बस या टैक्सी के माध्यम से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
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