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दो दशक से कांग्रेस की राजनीति के केंद्र रहे राहुल गांधी के खाते में 99वीं हार, जनता लगातार नकार रही उनका नेतृत्व

May 05, 2026

नई दिल्ली. करीब दो दशकों से राहुल गांधी (Rahul Gandhi) राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) के प्रमुख नेता के तौर पर लगातार सक्रिय रहे हैं। मार्च 2004 में राजनीति में प्रवेश के बाद से उन्होंने कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी के अभियान की कमान संभाली, लेकिन चुनावी नतीजों (Election Results) को लेकर उनके नेतृत्व पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उन्हें देशभर में 99 बार हार का सामना करना पड़ा है। जनता लगातार उनके नेतृत्व को नकारती रही है।

लोकसभा चुनावों में हार
2014, 2019 और 2024 में कांग्रेस को मिली हार।


  • विधानसभा चुनाव
    जम्मू-कश्मीर
    2014
    पंजाब
    2007
    2012
    2022
    हरियाणा
    2014
    2019
    2024
    दिल्ली
    2013
    2015
    2020
    2025
    गुजरात
    2007
    2012
    2017
    2022
    राजस्थान
    2013
    2023
    महाराष्ट्र
    2014
    2019
    2024
    गोवा
    2012
    2017
    2022
    कर्नाटक
    2004
    2008
    2018
    केरल
    2006
    2016
    2021
    मध्य प्रदेश
    2008
    2013
    2018
    2023
    तेलंगाना
    2014
    2018
    आंध्र प्रदेश
    2014
    2019
    2024
    पुडुचेरी
    2011
    2021
    2026
    तमिलनाडु
    2011
    2016
    2026
    हिमाचल प्रदेश
    2007
    2017
    उत्तराखंड
    2007
    2017
    2022
    सिक्किम
    2004
    2009
    2014
    2019
    2024
    उत्तर प्रदेश
    2007
    2012
    2017
    2022
    बिहार
    2005
    2010
    2020
    2025
    पश्चिम बंगाल
    2006
    2016
    2021
    2026
    अरुणाचल प्रदेश
    2019
    2024
    असम
    2016
    2021
    2026
    नगालैंड
    2008
    2013
    2018
    2023
    मणिपुर
    2017
    2022
    मिजोरम
    2018
    2023
    त्रिपुरा
    2008
    2013
    2018
    2023
    मेघालय
    2018
    2023
    झारखंड
    2005
    2009
    2014
    ओडिशा
    2004
    2009
    2014
    2019
    2024
    छत्तीसगढ़
    2008
    2013
    2023

    2026 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति
    केरल, पुदुचेरी, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव में केरल को छोड़कर बाकी राज्यों में कांग्रेस के हाथ निराशा लगी। कांग्रेस को केरल में 63, पश्चिम बंगाल में केवल दो, असम में 19, पुदुचेरी में एक सीटें और तमिलनाडु में पांच सीटें मिली।

    क्या कहते हैं राजनीतिक विशेषज्ञ?
    राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम कांग्रेस के लिए किसी बड़े राजनीतिक सदमे से कम नहीं हैं। केरल को छोड़कर, जहां वाम मोर्चे के खिलाफ दस साल की एंटी-इनकंबेंसी के चलते कांग्रेसनीत यूडीएफ की जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी, शेष चार राज्यों के नतीजों ने पार्टी की सांगठनिक कमजोरियों की पोल खोलकर रख दी है। इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस न तो अपनी पुरानी गलतियों से सबक ले रही है और न ही जोखिम उठाकर नई रणनीति बनाने का साहस दिखा पा रही है। यह न केवल कांग्रेस, बल्कि पूरे इंडिया ब्लॉक के लिए करारा झटका है, जिससे उबरना उसके लिए काफी मुश्किल होगा।

    तमिलनाडु के नतीजों ने कांग्रेस की भारी रणनीतिक खामियों को उजागर किया
    किदवई ने कहा कि पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस ने जैसा प्रदर्शन किया, वह काफी हद तक अपेक्षित भी था, लेकिन तमिलनाडु के नतीजों ने कांग्रेस नेतृत्व की भारी रणनीतिक खामियों को उजागर कर दिया है। अचरज तो इस बात को लेकर है कि पार्टी नेतृत्व राज्य में द्रमुक के खिलाफ पनप रहे सत्ता विरोधी रुझान को भांपने में हर स्तर पर विफल रहा। कांग्रेस के आंतरिक सर्वे भी राज्य में अभिनेता विजय की नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (टीवीके) के एक मजबूत ताकत के रूप में उभरने के संकेत दे रहे थे। कांग्रेस के पास टीवीके के साथ गठबंधन करने का तब एक सुनहरा अवसर भी था, जब खुद विजय के पिता एसए चंद्रशेखर ने साल की शुरुआत में स्वयं गठबंधन करने का प्रस्ताव दिया था।

    विजय की पार्टी के साथ चुनावी तालमेल करने की जोरदार पैरवी करने वाले कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक टीवी चैनल पर कहा भी कि हमने राज्य में एक बड़ा मौका गंवा दिया। उनके मुताबिक, अगर राज्य में कांग्रेस और टीवीके के बीच गठबंधन होता, तो राहुल गांधी और विजय की जोड़ी राज्य में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आती। बकौल चक्रवर्ती, राज्य के युवा मतदाता बदलाव चाहते थे। ज्योति मणि और मणिकम टैगोर जैसे युवा कांग्रेसी सांसद भी पुराने गठबंधन को छोड़कर टीवीके के साथ जाने के पक्ष में थे। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता पुरानी वफादारी पर अड़ गए। राहुल गांधी और केंद्रीय नेतृत्व ने भी पी चिदंबरम जैसे कुछ दिग्गज कांग्रेस नेताओं की सलाह को तरजीह दी और टीवीके के साथ गठबंधन करने का साहस नहीं दिखा पाए।

    असम चुनाव में कांग्रेस से कहां कमी रह गई?
    विशेषज्ञ बताते हैं कि असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के प्रखर हिंदुत्ववादी एजेंडे का मुकाबला करना कांग्रेस के लिए पहले से ही आसान नहीं था, लेकिन पार्टी वहां कुछ बेहतर करने की अपेक्षा तो रख सकती थी। किंतु, समस्या यह थी कि वहां भाजपा से लड़ने के बजाय पार्टी के वरिष्ठ नेता आपस में ही सिर-फुटव्वल में लगे रहे। किसी राज्य में चुनावी सफलता के लिए प्रदेश इकाई में जिस तालमेल की दरकार होती है, वह असम में गायब था। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के राज्य प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के बीच एक तरह से संवादहीनता की स्थिति बनी रही। केंद्रीय नेतृत्व ने भी समय रहते दखल नहीं दिया, मानो उसने उस नियति को पहले ही स्वीकार कर लिया, जो आज ईवीएम खुलने के बाद सामने आई है।

    पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की चूक
    वहीं पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दूसरे चरण में राहुल गांधी द्वारा ममता बनर्जी पर किया गया सीधा हमला इंडिया गठबंधन के लिए आत्मघाती साबित हुआ। ममता की तीखी आलोचना ने भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित कर दिया, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला। हालांकि, ममता की हार का श्रेय भाजपा के सुनियोजित चुनावी प्रबंधन को ज्यादा दिया जाना चाहिए, लेकिन कांग्रेस की रणनीति ने इस पराजय को और विराट बना दिया। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने जो धाक जमाई थी, वह अब दो साल के भीतर ही खत्म-सी होती नजर आ रही है। दोनों एक बार फिर सिफर पर जा खड़े हुए हैं। भाजपा ने हिंदुत्व का जो नैरेशन गढ़ लिया है, उसकी कोई प्रभावी काट किसी भी विपक्षी दल के पास दिखाई नहीं देती। तृणमूल और द्रमुक की इस जबर्दस्त हार के बाद विपक्ष की रही-सही उम्मीद भी चली गई है।

    किदवई ने कहा अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड भाजपा के लिए हिंदुत्व की सफल प्रयोगशालाएं रही हैं, जहां यह कार्ड अब और अधिक आक्रामकता के साथ खेला जाएगा। ऐसे में, टूटे हुए मनोबल के साथ कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भाजपा की मशीनरी का मुकाबला कैसे करेंगे, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।

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