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मोहन भागवत पर राज ठाकरे का तीखा प्रहार डर से भरे थे मंच पर बैठे सितारे प्यार से नहीं सत्ता की दहशत से जुटी भीड़

February 11, 2026

नई दिल्ली। मुंबई (Mumbai)में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh)के सौ साल पूरे होने पर आयोजित भव्य समारोह (grand celebration)अब सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। इस कार्यक्रम में सलमान खान अक्षय कुमार प्रीतम रवीना टंडन अनन्या पांडे करण जौहर समेत फिल्म जगत की कई चर्चित हस्तियां शामिल(celebrities attended) हुईं। लेकिन इस उपस्थिति को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे(Maharashtra Navnirman Sena chief Raj Thackeray) ने संघ प्रमुख मोहन भागवत पर सीधा और तीखा हमला बोला है।

राज ठाकरे ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि समारोह में पहुंचे लोग किसी प्रेम या वैचारिक जुड़ाव के कारण नहीं आए थे बल्कि वे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के डर से वहां मौजूद थे। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अगर ऐसा नहीं होता तो पहले कभी इतने बोरिंग और उबाऊ भाषणों को सुनने कोई क्यों नहीं आता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह गलतफहमी पालने की जरूरत नहीं है कि लोग भागवत के प्रति सम्मान या स्नेह के कारण वहां पहुंचे थे।

राज ठाकरे का हमला यहीं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आठ फरवरी को मुंबई में हुए एक कार्यक्रम में मोहन भागवत द्वारा भाषा पर जोर देने और उसके लिए आंदोलन करने को बीमारी बताए जाने पर भी कड़ा प्रतिवाद किया। राज ठाकरे ने कहा कि देश में राज्यों का पुनर्गठन ही भाषा के आधार पर हुआ है और यह ऐतिहासिक और सामाजिक आवश्यकता थी। यदि अपनी भाषा और अपने क्षेत्र से प्रेम करना बीमारी है तो यह बीमारी देश के अधिकांश राज्यों में फैली हुई है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कर्नाटक तमिलनाडु आंध्र प्रदेश पश्चिम बंगाल पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता गहरी जड़ें रखती है। जब दूसरे राज्यों से बड़े समूह किसी प्रदेश में आकर वहां की संस्कृति और भाषा का अनादर करते हैं और राजनीतिक समीकरण साधते हैं तो स्थानीय लोगों में स्वाभाविक असंतोष पैदा होता है। इसे बीमारी कहना वास्तविकता से आंख मूंदना है।

राज ठाकरे ने यह भी सवाल उठाया कि जब गुजरात में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को निकाले जाने की घटनाएं हुईं तब मेलजोल का संदेश देने कोई क्यों नहीं पहुंचा। उन्होंने आरोप लगाया कि मराठी समाज की सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझा जाता है और यहां के शासकों की कथित रीढ़हीनता के कारण ही ऐसे बयान दिए जाते हैं।

उन्होंने भैयाजी जोशी के उस पुराने बयान का भी जिक्र किया जिसमें मुंबई की भाषा को केवल मराठी नहीं बल्कि गुजराती भी बताया गया था। राज ठाकरे के अनुसार यह बयान चुनाव से पहले गुजराती वोटरों को साधने की कोशिश थी और इससे राजनीतिक लाभ पहुंचाने की मंशा झलकती है। उन्होंने कहा कि संघ खुद को गैर राजनीतिक संगठन बताता है तो उसे परोक्ष राजनीति से दूर रहना चाहिए।


  • अंत में राज ठाकरे ने चुनौतीपूर्ण स्वर में कहा कि यदि संघ सच में संतुलन की बात करता है तो उसे पहले केंद्र सरकार द्वारा हिंदी थोपने के प्रयासों पर खुलकर बोलना चाहिए और उसके बाद ही दूसरों को मेलजोल और सद्भाव का पाठ पढ़ाना चाहिए। मुंबई का यह समारोह अब वैचारिक टकराव और भाषा की राजनीति के नए अध्याय की तरह देखा जा रहा है।

     

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