
इंदौर। भक्तिपूर्वक सिद्ध भगवान के 2008 मुखों की आराधना करने से व्यक्ति का जीवन मंगलमय बनता है और प्रभु से सच्चा संबंध स्थापित होता है। विधान का आयोजन केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और जीवन को सार्थक बनाने का माध्यम है। विधान करने से व्यक्ति जीवन में परिवर्तन होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है और मंत्रों की सिद्धि प्राप्त होती है।
यह कहना था उत्तराचार्य विनम्रसागर महाराज का। उनके अनुसार सिद्धचक्र विधान वर्ष में एक बार अवश्य किया जाना चाहिए। यह विधान आत्मा की विशुद्धता और सातिशय पुष्टता को बढ़ाने वाला है। तिलक नगर परिसर में आज सुबह मंगल ध्वनियों के साथ भगवान का शांति धारा अभिषेक किया गया। अर्घ पूजन, अभिषेक की प्रक्रिया के बाद विधान शुरू हुआ। 8 दिनी इस आयोजन के शुभारंभ पर बड़ी संख्या में जैन समाजजन शामिल हुए। इस आयोजन की शुरुआत भव्य धार्मिक अनुष्ठानों, भक्ति गीतों और श्रद्धा के वातावरण में हुई।
आयोजन का समापन 5 नवंबर को शांतिधारा और महाआरती के साथ होगा। महोत्सव के अध्यक्ष राहुल जैन केसरी ने बताया कि पहले दिन सुबह मंगलाचरण और पूजा-अर्चना के बीच ध्वजारोहण का कार्य नम्रता प्रवीण दिवाकर द्वारा किया गया। मंडप उद्घाटन नवीन-शिवानी गोधा, धर्मेंद्र-संध्या जैन और मनीष-संगीता नायक ने संयुक्त रूप से किया। आयोजन के दौरान समाज के संरक्षक राजेश उदावत, विमल अजमेरा और राजू श्रीफल विशेष रूप से उपस्थित रहे। शुभारंभ से पहले तिलक नगर क्षेत्र में भव्य घटयात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं कलश लेकर शामिल हुईं। पुरुषों ने धार्मिक ध्वज और बैनर थामे जय जिनेंद्र के जयकारों के साथ नगर भ्रमण किया।
2 नवंबर को निकलेगी यात्रा
सिद्धचक्र महामंडल विधान के तहत 2 नवंबर को भव्य चक्रवर्ती दिग्विजय यात्रा निकाली जाएगी। यह यात्रा तिलक नगर जैन मंदिर से सुबह 6 बजे प्रारंभ होकर क्षेत्र के प्रमुख मार्गों से निकलेगी और वर्धमान मंगलिक भवन पर सम्पन्न होगी। यात्रा में रथ, ध्वज, नाद-ढोल, पुष्पवर्षा और समाज के श्रद्धालुओं का अद्भुत समावेश रहेगा। मुनिश्री के सान्निध्य में यह यात्रा आत्मकल्याण, सद्भाव और शांति का संदेश देगी।
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