
नई दिल्ली। बिहार (Bihar) में वर्ष 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी (Alcohol Prohibition) को सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की इस पहल का खासकर महिलाओं ने स्वागत किया था, क्योंकि इससे घरेलू हिंसा, आर्थिक नुकसान और शराब की लत से जुड़ी समस्याओं में कमी आने की उम्मीद थी। लेकिन आठ साल बाद सामने आए सरकारी आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।
शराबबंदी के बावजूद बढ़े शराब पीने वाले
भारत सरकार के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 15 वर्ष से अधिक आयु के करीब 16.5 प्रतिशत पुरुषों ने शराब सेवन की बात स्वीकार की है। यह आंकड़ा पिछले सर्वे NFHS-5 (2019-21) के 15.4 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यानी शराबबंदी लागू होने के बाद भी शराब पीने वालों की संख्या में कमी नहीं आई। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि राज्य में 0.4 प्रतिशत महिलाएं भी शराब का सेवन कर रही हैं, जबकि प्रदेश में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है।
ग्रामीण इलाकों में ज्यादा असरहीन दिखी शराबबंदी
सर्वे के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 17.1 प्रतिशत पुरुष शराब पीते हैं, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 12.8 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि गांवों में अवैध शराब की उपलब्धता और निगरानी की अपेक्षाकृत कमी के कारण शराबबंदी का प्रभाव सीमित नजर आता है।
शराब की जगह नशीली दवाओं की ओर बढ़ा रुझान
विशेषज्ञों के अनुसार शराबबंदी के बाद कई लोगों ने वैकल्पिक नशे की ओर रुख किया। पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के चिकित्सकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नशीली दवाओं, स्लीपिंग पिल्स और अन्य फार्मास्यूटिकल उत्पादों के दुरुपयोग के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।
हाल के दिनों में पुलिस ने कोडीन युक्त कफ सिरप की बड़ी खेपें भी जब्त की हैं। कोडीन का अधिक मात्रा में सेवन नशे के रूप में किया जाता है और इसे शराब के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई जा रही है।
NDPS मामलों में 150 प्रतिशत की वृद्धि
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2020 में राज्य में NDPS एक्ट के तहत 964 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 2,411 पहुंच गई। यानी चार वर्षों में ऐसे मामलों में लगभग 150 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। NDPS अधिनियम नशीले पदार्थों और मन:प्रभावी दवाओं से जुड़े अपराधों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है।
आंकड़ों ने खड़े किए कई सवाल
शराबबंदी लागू होने के समय उम्मीद की गई थी कि इससे नशे की प्रवृत्ति कम होगी और सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव आएंगे। हालांकि ताजा आंकड़े संकेत देते हैं कि शराब पर प्रतिबंध के बावजूद नशे की समस्या पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है। शराब सेवन के आंकड़ों में वृद्धि और नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में तेज उछाल ने नीति की प्रभावशीलता पर नई बहस छेड़ दी है।
सरकारी सर्वे और अपराध रिकॉर्ड दोनों यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या केवल प्रतिबंध लगाना नशे की समस्या का समाधान है, या इसके साथ जागरूकता, पुनर्वास और प्रभावी निगरानी जैसे कदमों की भी समान रूप से आवश्यकता है।
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