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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी

January 16, 2026


नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका (Petition filed by Justice Yashwant Verma of Allahabad High Court) खारिज कर दी (Dismissed) । उन्होंने लोकसभा स्पीकर के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें जजेस (जांच) एक्ट, 1968 के तहत उनके खिलाफ तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई थी।


  • दरअसल जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आवास से बड़ी मात्रा में जली और अधजली करेंसी बरामद हुई थी। एक जज बके यहां से इस कैश बरामदगी के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। शुक्रवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा, “हमारा मानना ​​है कि याचिकाकर्ता इस मामले में किसी भी राहत का हकदार नहीं है।” पिछले हफ्ते जस्टिस दत्ता की बेंच ने सभी पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद जस्टिस वर्मा की रिट याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

    अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक आधार पर लोकसभा स्पीकर के फैसले को चुनौती दी है। याचिका में तर्क दिया गया कि हालांकि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन महाभियोग के नोटिस दिए गए थे, लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने राज्यसभा चेयरमैन के फैसले का इंतजार किए बिना या अनिवार्य संयुक्त परामर्श किए बिना एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन कर दिया।

    यह तर्क दिया गया कि जजों (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) का प्रावधान यह कहता है कि जब दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाते हैं, तो कोई भी समिति तब तक गठित नहीं की जा सकती, जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न हो जाए और वह भी स्पीकर और चेयरमैन की संयुक्त कार्रवाई से।

    लोकसभा सचिवालय ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। यह बताया गया कि तत्कालीन चेयरमैन और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के जुलाई में इस्तीफा देने के बाद 11 अगस्त 2025 को राज्यसभा के उपसभापति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 3(2) का प्रोविजो लागू नहीं होता है और लोकसभा स्पीकर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने के लिए अपने अधिकारों के दायरे में थे।

    लोकसभा और राज्यसभा के अधिकारियों की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सेक्शन 3(2) के प्रोविजो का मकसद सिर्फ एक ही आरोपों पर दो अलग-अलग जांच कमेटियों के गठन से बचना था। सेक्शन 3(2) के प्रोविजो के मुताबिक अगर दो प्रस्ताव अलग‑अलग दिनों में संसद के दोनों सदनों में दिए जाते हैं, तो बाद वाला प्रस्ताव स्वतः रद्द हो जाएगा। केंद्र के दूसरे सबसे बड़े कानून अधिकारी ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करना ऑटोमैटिक नहीं होता और इसके लिए संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को सोच-समझकर फैसला लेना होता है।

    जस्टिस वर्मा मार्च 2025 से विवादों के केंद्र में हैं, जब कथित तौर पर उनके आधिकारिक आवास के एक आउटहाउस में जले हुए नोट मिले थे, उस समय वह दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। हालांकि आग लगने के समय वह वहां मौजूद नहीं थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच कमेटी ने बाद में यह निष्कर्ष निकाला कि उन्होंने कैश के ढेर पर गुप्त या सक्रिय नियंत्रण रखा था।

    जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने हटाने की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की थी। पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें इन-हाउस जांच को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तय की गई इन-हाउस प्रक्रिया “निष्पक्ष और न्यायसंगत” है और यह न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करती है, जो संविधान का बुनियादी सिद्धांत है।

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