नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के प्रमाणपत्रों की वैधता को लेकर कानूनी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें राज्य सरकार की ओर से 8 मई 2025 से 18 मई 2025 के बीच जारी किए गए सभी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
नियुक्ति पत्रों में शामिल करनी होगी शर्त
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक कुछ रिक्त सरकारी पदों पर नियुक्तियां नहीं की जाएं। इस पर पीठ ने कहा कि सरकारी पदों को खाली नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले के दायरे में आने वाली नियुक्तियां याचिका के अंतिम नतीजे के अधीन होंगी। राज्य सरकार को सफल उम्मीदवारों को जारी किए जाने वाले नियुक्ति पत्रों में भी इस संबंध में स्पष्ट शर्त शामिल करनी होगी। इससे नियुक्तियों की प्रक्रिया जारी रह सकेगी, जबकि प्रमाणपत्रों की वैधता का मुद्दा न्यायिक विचाराधीन रहेगा।
2010 से 2012 के बीच जारी आदेशों से शुरू हुआ विवाद
पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण को लेकर विवाद मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुआ था। अदालत ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार की ओर से वर्ष 2010 से 2012 के बीच जारी कार्यकारी आदेशों के तहत OBC सूची में शामिल की गई कई श्रेणियों को रद्द कर दिया था।
हाईकोर्ट ने OBC वर्ग को OBC-A और OBC-B में बांटने तथा इन दोनों श्रेणियों के बीच कुल 17 प्रतिशत आरक्षण के वितरण से जुड़े प्रावधानों को भी अपने फैसले में निरस्त किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने मई और जून 2025 में नई अधिसूचनाएं जारी कर संशोधित OBC आरक्षण नीति लागू करने की कोशिश की।
हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 17 जून 2025 को इन अधिसूचनाओं पर रोक लगा दी। अदालत का कहना था कि राज्य सरकार कार्यकारी आदेश जारी करके न्यायालय के पहले के फैसले को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
नई अधिसूचनाओं के आधार पर जारी प्रमाणपत्र भी विवाद में
इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के दौरान पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ। शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दायर अपनी अपीलें वापस ले ली थीं।
वर्तमान याचिकाएं कलकत्ता हाईकोर्ट के 12 अगस्त के आदेश के बाद दायर की गईं। इस आदेश में वर्ष 2025 की अधिसूचना के तहत अप्रैल 2026 में जारी OBC-A प्रमाणपत्र के आधार पर राहत मांगने वाले एक उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी गई थी।
इसके बाद प्रमाणपत्रों की वैधता और उनके आधार पर सरकारी नियुक्तियों में मिलने वाले लाभों को लेकर कानूनी सवाल फिर उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अब पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है।
मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह तय होगा कि विवादित अवधि में जारी OBC प्रमाणपत्रों की वैधता को लेकर हाईकोर्ट के आदेश पर क्या रुख अपनाया जाता है। फिलहाल, प्रमाणपत्रों और उनके आधार पर मिलने वाले आरक्षण लाभों को लेकर अंतिम स्थिति न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
अदालत ने सरकारी नियुक्तियों को पूरी तरह रोकने के बजाय उन्हें लंबित याचिका के परिणाम के अधीन रखने का निर्देश दिया है। इसलिए संबंधित उम्मीदवारों और नियुक्ति प्रक्रियाओं पर इस मामले का असर सुप्रीम कोर्ट के आगामी आदेशों के अनुसार तय होगा।
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