
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में इजरायल और ईरान (Israel and Iran)के बीच तेज होते टकराव ने एशियाई भू-राजनीति (geopolitics) को नई दिशा दे दी है। यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है बल्कि इसके दूरगामी असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकते हैं।भारत दोनों देशों के साथ संतुलित (balanced) और मजबूत संबंध रखता है। एक ओर इजरायल रक्षा (defence) और तकनीकी सहयोग में अहम साझेदार है, तो दूसरी ओर ईरान ऊर्जा आपूर्ति (energy supply) और मध्य एशिया तक पहुंच का प्रमुख द्वार रहा है। ऐसे में युद्ध की स्थिति भारत की कूटनीतिक (diplomatic) संतुलन नीति की बड़ी परीक्षा बन सकती है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में ईरान का महत्व लंबे समय से रहा है। प्रतिबंधों से पहले भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था। इसके अलावा वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान चाबहार बंदरगाह के विकास को लेकर अहम समझौता हुआ था। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक बिना पाकिस्तान के रास्ते पहुंच सकता है। यदि युद्ध के कारण ईरान अस्थिर होता है या समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं तो चाबहार परियोजना और उससे जुड़ी भारत की कनेक्टिविटी रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है।
यहीं से चीन और पाकिस्तान के लिए अवसर बन सकता है। चीन पहले ही पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में भारी निवेश कर चुका है और उसे क्षेत्रीय व्यापारिक हब के रूप में विकसित कर रहा है। यदि चाबहार की प्रगति बाधित होती है तो ग्वादर को बढ़त मिल सकती है जिससे चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और मजबूत होगा। इससे भारत की मध्य एशिया में रणनीतिक पकड़ कमजोर पड़ सकती है।
ईरान के रास्ते भारत का संपर्क कजाकिस्तान जैसे देशों से भी जुड़ता है जहां से रेयर अर्थ मिनरल्स और यूरेनियम जैसे संसाधनों का आयात होता है। युद्ध की स्थिति में आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से भारत की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा वैश्विक तेल कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई का अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
सामरिक दृष्टि से भी स्थिति जटिल हो सकती है। यदि अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों की भूमिका बढ़ाता है तो पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे फिर से महत्वपूर्ण बना सकती है। अतीत में अफगानिस्तान संकट के दौरान पाकिस्तान की भूमिका अहम रही है। ऐसे में इस्लामाबाद वाशिंगटन से आर्थिक और सैन्य लाभ लेने की कोशिश कर सकता है।
भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने राष्ट्रीय हितों ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख बनाए रखे। खाड़ी क्षेत्र में बड़ी भारतीय आबादी निवास करती है इसलिए किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति में निकासी और सुरक्षा प्रबंधन भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। कुल मिलाकर इजरायल ईरान संघर्ष एशिया की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है और भारत को बेहद सावधानी से अपने कदम आगे बढ़ाने होंगे।
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