नई दिल्ली। भारतीय संगीत की दुनिया (world of indian music) में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि परंपरा और संस्कृति की जीवित मिसाल बन जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (Ustad Bismillah Khan) जिनकी शहनाई ने भारत की आत्मा को पूरी दुनिया तक पहुंचाया।
मजहब से मुस्लिम होने के बावजूद उस्ताद बिस्मिल्लाह खां रोज मंदिर की चौखट पर बैठकर रियाज करते थे। उनके लिए संगीत ही सबसे बड़ा धर्म था और ‘सच्चा सुर’ ही उनकी इबादत। बनारस के मंदिरों में घंटों साधना करते हुए वे मां सरस्वती को नमन करते और सुरों में डूब जाते थे।
21 मार्च को जन्मे बिस्मिल्लाह खां का संगीत सफर बचपन में ही शुरू हो गया था। महज 6 साल की उम्र में वे बनारस पहुंचे, जहां की गलियों, घाटों और मंदिरों ने उनकी कला को नई दिशा दी। गंगा के किनारे बैठकर किया गया उनका रियाज ही आगे चलकर उनकी पहचान बना।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने जीवन के अंतिम क्षण तक संगीत की साधना नहीं छोड़ी। उनके लिए शहनाई सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज थी। यही कारण है कि उनकी धुनों में गंगा-जमुनी तहजीब की झलक साफ दिखाई देती है।
बिस्मिल्लाह खां महान कलाकार होने के साथ-साथ दूसरे कलाकारों के भी बड़े कद्रदान थे। वे लता मंगेशकर की आवाज को बेमिसाल मानते थे। दिलचस्प बात यह है कि वे अक्सर उनके गानों में कोई कमी खोजने की कोशिश करते, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ ‘पूर्णता’ ही नजर आती।
उनका मानना था कि लता के सुर, शब्द और अभिव्यक्ति इतनी सटीक होती थी कि उसमें कोई खामी निकालना लगभग असंभव है।
सिर्फ लता ही नहीं, बल्कि बेगम अख्तर की गायकी के भी वे मुरीद थे। एक बार आधी रात को उनकी गजल सुनकर वे इतने प्रभावित हुए कि उस आवाज के स्रोत को ढूंढ़ने निकल पड़े।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को साल 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। उसी वर्ष लता मंगेशकर को भी यह सम्मान मिला।
दोनों ही कलाकारों ने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम योगदान दिया।
बिस्मिल्लाह खां की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि कला किसी धर्म या सीमा में बंधी नहीं होती। मंदिर की चौखट पर बैठकर शहनाई बजाने वाला यह फनकार आज भी अपनी सादगी, समर्पण और सुरों के लिए याद किया जाता है।
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