
ढोल की पोल… ब्याज-बट्टे और बिजली का बिल भरने में ही टूट जाएगी कमर, पहले से ही आर्थिक हालत खस्ता, नर्मदा के चौथे चरण का भी जोर-शोर से हो गया भूमिपूजन
इंदौर, राजेश ज्वेल
सबसे अधिक राजस्व (Revenue) देने और प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कहलाने वाला इंदौर (Indore) अपने बलबूते पर ही तरक्की करता रहा है, जिसमें सरकारी योगदान कम ही मिला। यहां तक कि मास्टर प्लान (master plan) से लेकर कई निर्णय अधूरे पड़े हैं, तो दूसरी तरफ एक और विसंगति ये भी है कि आबकारी विभाग (Excise Department) इन दिनों शराब दुकानों की नीलामी में जुटा है और 2100 करोड़ रुपए से अधिक का राजस्व इंदौरियों को शराब पिलाने के एवज में ठेकेदारों के माध्यम से कमाएगा, तो इंदौर निगम को नर्मदा का पानी पिलाने के लिए 1530 करोड़ रुपए का लोन लेना पड़ा। नर्मदा का चौथा चरण इंदौर की बढ़ती आबादी के मद्देनजर तो अत्यावश्यक है ही, वहीं इसके साथ चुनौतियां भी कम नहीं है। ब्याज-बट्टे के अलावा भारी-भरकम बिजली बिल भी भरना पड़ेगा। वर्तमान में ही 150 करोड़ रुपए से अधिक का बिजली बिल निगम नहीं भर पाता है और शासन चुंगी क्षतिपूर्ति या अन्य मदों में से ये राशि काट लेता है।
वर्तमान में 85 वार्डों में ही 450 एमएलडी तीनों चरणों का पानी अपर्याप्त रहता है, जिसके कारण अधिकांश जनता निजी बोरिंग और गर्मियों में टैंकरों के भरोसे रहती है। अभी चौथे चरण के लिए दावा किया जा रहा है कि 24 ही घंटे पानी मिलेगा, जो कि संभव ही नहीं है। वर्तमान में ही निगम एक दिन छोडक़र एक घंटे भी पूरे शहर को पानी नहीं पिला पा रहा है। कल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने चौथे चरण का शुभारंभ किया, जिसकी लागत 1356 करोड़ रुपए है। 2040 तक इंदौर की अनुमानित 65 लाख की जनसंख्या को देखते हुए जल प्रबंधन की यह योजना तैयार की गई है। जलूद से इंदौर पानी लाकर बंटवाना देश ही नहीं, दुनिया की सबसे महंगी परियोजनाओं में से एक है। चौथे चरण के चार पैकेजों के लिए नगर निगम को 1530 करोड़ रुपए का लोन लेना पड़ा है, तो दूसरी तरफ उसके रख-रखाव से लेकर बिजली का भारी-भरकम बिल ही कमर तोड़ देगा। जलूद का सोलर प्लांट तो मात्र 4-5 करोड़ रुपए के बिजली बिल की ही बचत करेगा। जबकि कुल बिजली बिल 300 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच जाएगा। वर्तमान में ही निगम नर्मदा के तीनों चरणों के संधारण, संचालन पर ही 200 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च करता है और नर्मदा के कनेक्शनों से उसे 50-60 करोड़ रुपए भी सालाना नहीं मिलते हैं। ऐसे में चौथा चरण, जो 2029 तक पूर्ण होने का दावा किया गया है और उसके माध्मय से 900 एमएलडी पानी इंदौर पहुंचेगा। यानी वर्तमान का खर्चा दो गुना से अधिक तब तक बढ़ जाएगा। निगम राजनीतिक नुकसान के भय से पानी का बिल नहीं बढ़ा पाता है, जबकि लागत कई गुना अधिक आती है। इंदौर से ही राज्य शासन के खजाने को सबसे अधिक राजस्व मिलता है। पंजीयन विभाग जहां ढाई से तीन हजार करोड़ रुपए का राजस्व देता है, तो दूसरे नम्बर पर आबकारी विभाग है, जो इस बार के शराब ठेकों से ही अभी तक 2 हजार करोड़ रुपए और बची दुकानों से 300 करोड़ रुपए से अधिक अगर कमाता है, तो भी 2100 करोड़ से अधिक हासिल कर लेगा। यानी इंदौरियों को शराब पिलाने के एवज में सरकार 2100 करोड़ रुपए से अधिक कमाएगी, लेकिन इंदौर की जनता को नर्मदा का पानी पिलाने के लिए 1530 करोड़ का लोन लेना पड़ा। अगर एक साल की आबकारी आय ही दे दी जाए तो इंदौर निगम को भी बड़ी राहत मिले और जनता को पेयजल सुविधा बेहतर तरीके से उपलब्ध कराई जा सकती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved