
जयपुर/डीडवाना-कुचामन । केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी (Union Minister of State for Agriculture Bhagirath Choudhary) ने अपने ही विभाग से 99.60 लाख रुपए की सब्सिडी ली (Availed Subsidy of Rs.99.60 Lakh from his own Department) ।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पारिवारिक जमीन-सौदों का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि अब राजस्थान भाजपा के कद्दावर नेता और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी एक बड़े राजनीतिक और नैतिक विवाद के केंद्र में आ गए हैं। उन पर अपने ही मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण वाले बोर्ड से करीब एक करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी लेने का गंभीर आरोप लगा है, जिसने लोकतांत्रिक नैतिकता और ‘हित-संघर्ष’ के सवाल को हवा दे दी है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान से सांसद और वर्तमान में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव में स्थित उनके खीरे के फार्म प्रोजेक्ट के लिए 99 लाख 60 हजार रुपये की सरकारी सब्सिडी जारी की गई है।
मंत्री के फार्म पर लगे आधिकारिक बोर्ड के अनुसार, इस हाई-टेक कृषि परियोजना की कुल लागत 1 करोड़ 99 लाख 20 हजार रुपये है। इसमें वित्तीय विभाजन इस प्रकार दर्शाया गया है-कुल लागत: 1,99,20,000 रुपए, मंत्री का निजी हिस्सा 49,80,000 रुपए , सरकारी सहायता (50% सब्सिडी) 99,60,000 रुपए । सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, 30 मार्च 2026 को 99.03 लाख रुपए की राशि “कैपिटल इन्वेस्टमेंट सब्सिडी” के रूप में उनके एचडीएफसी बैंक के लोन खाते में ट्रांसफर की गई। हालांकि यह पैसा सीधे नकद रूप में जेब में नहीं गया, लेकिन इसने उनके निजी कमर्शियल प्रोजेक्ट के बैंक कर्ज को सीधे तौर पर आधा कर दिया।
भागीरथ चौधरी न केवल इसी कृषि मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं, बल्कि वे नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड के पदेन उपाध्यक्ष भी हैं। यद्यपि तकनीकी रूप से अंतिम मंजूरी देने वाली ‘प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी’ में मंत्री स्वयं सदस्य नहीं थे, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या कोई कैबिनेट या राज्य मंत्री अपने ही विभाग के नियंत्रण वाले बोर्ड का वित्तीय लाभार्थी हो सकता है? आम किसानों को जहां ऐसी बड़ी सरकारी योजनाओं की जांच, भौतिक सत्यापन और कागजी औपचारिकताओं के लिए महीनों या सालों चक्कर काटने पड़ते हैं, वहीं मंत्री के प्रोजेक्ट को आवेदन के मात्र 14 दिनों के भीतर इन-प्रिंसिपल (सैद्धांतिक) मंजूरी दे दी गई। फार्म पर लगे सूचना बोर्ड में यह तो लिखा है कि परियोजना को एनएचबी से सहायता मिली है, लेकिन यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया कि इसका मालिकाना हक उसी मंत्रालय के मंत्री के पास है।
प्रधानमंत्री कार्यालय में दाखिल की गई उनकी संपत्ति घोषणा में कृषि भूमि का जिक्र तो है, लेकिन इस विशिष्ट बहु-करोड़ी एनएचबी प्रोजेक्ट का स्पष्ट विवरण नहीं दिखता। मंत्री के करीबियों का कहना है कि यह जानकारी सरकार को बाद में दे दी जाएगी, जिस पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। यह मामला देश की उस कृषि व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है जहां आम छोटा किसान कर्ज और कागजी पेचीदगियों में उलझकर दम तोड़ देता है, वहीं सत्ता के शीर्ष पर बैठे रसूखदार लोग नियमों की आड़ में करोड़ रुपये की राहत आसानी से पा लेते हैं।
अपने ही मंत्रालय के अधीन आने वाले नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड से खीरे की खेती (पॉलीहाउस प्रोजेक्ट) के लिए करीब 99 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी लेने के आरोपों पर केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने शनिवार को अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दी । अजमेर में मीडियाकर्मियों से बातचीत करते हुए मंत्री ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और पूरे मामले को पूरी तरह पारदर्शी बताया। “बचपन से कर रहा हूँ खेती, कुछ भी नहीं छिपाया” : केंद्रीय राज्य मंत्री ने खुद पर लगे ‘हित-संघर्ष’ के आरोपों को नकारते हुए अपनी किसान पृष्ठभूमि को सामने रखा। उन्होंने कहा: “मैं पहले एक किसान हूँ और अपने बचपन के दिनों से ही कृषि कार्य से जुड़ा हुआ हूँ। मैंने सरकार या जनता से कुछ भी नहीं छिपाया है। देश भर में हजारों किसान पॉलीहाउस लगाते हैं और इस तरह की सरकारी सब्सिडी का लाभ उठाते हैं, एक किसान होने के नाते मैंने भी वही किया है।”
मंत्री भागीरथ चौधरी ने इस प्रोजेक्ट की समय-सीमा स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्होंने इस सब्सिडी और लोन के लिए साल 2018 में आवेदन किया था। उन्होंने पारदर्शिता का दावा करते हुए आगे कहा, “मैंने अपने फार्म पर एक बड़ा सूचना बोर्ड लगा रखा है, जिसमें बैंक से लिए गए लोन और सरकार से मिली सब्सिडी का पूरा ब्योरा साफ-साफ लिखा हुआ है। स्थानीय स्तर के सभी प्रशासनिक अधिकारी भी इस जगह का दौरा और भौतिक सत्यापन कर चुके हैं। जब सब कुछ रिकॉर्ड पर है, तो यह कहना गलत है कि मैंने कुछ छिपाया है।” केंद्रीय मंत्री ने बताया कि यह प्रोजेक्ट सिर्फ उनके निजी लाभ के लिए नहीं है, बल्कि वे इस फॉर्म का उपयोग क्षेत्र के अन्य किसानों के कल्याण के लिए भी कर रहे हैं। इस आधुनिक कृषि फॉर्म पर स्थानीय और दूर-दराज से आने वाले किसानों को खेती की नई तकनीकों और प्राकृतिक खेती का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
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