
चंडीगढ़। हाई कोर्ट की जस्टिस सुखविंदर कौर (Justice Sukhvinder Kaur) ने साध्वी यौन शोषण मामले में सजा के खिलाफ डेरा सच्चा सौदा सिरसा के प्रमुख गुरमीत सिंह (Gurmeet Singh) की अपील पर सुनवाई से अपने को अलग करते हुए मामला कार्यवाहक चीफ जस्टिस को भेज दिया है। उन्होंने आग्रह किया कि इस मामले को ऐसी किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसके सदस्य के रूप में जस्टिस सुखविंदर कौर सम्मिलित न हों। दरअसल, यह मामला जस्टिस विनोद एस भारद्वाज व जस्टिस सुखविंदर कौर के पास सूचीबद्ध था और दिन से इस मामले पर यह बेंच सुनवाई कर रही थी।
कोर्ट के आदेश पर डेरा प्रमुख का कस्टडी सर्टिफिकेट भी कोर्ट में पेश किया था जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर ले लिया। कार्यवाहक चीफ जस्टिस तय करेंगे की इस मामले की सुनवाई कौन सी पीठ करेगी। इससे पहले की बहस में डेरा प्रमुख के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि कथित घटनाएं 1999 की बताई गईं, लेकिन पहली बार दुष्कर्म का आरोप 2006 में सामने आया, जबकि 2002 से 2005 तक दिए गए कई बयानों में ऐसा कोई आरोप नहीं था।
नए डेरों का किया गया जिक्र
बचाव पक्ष के वकील जितेंद्र खुराना ने अदालत को यह भी बताया कि कथित घटनास्थल को लेकर भी भारी अस्पष्टता है। चार्ज में केवल “डेरा सच्चा सौदा क्षेत्र स्थित गुफा” लिखा गया, जबकि गवाही में दो अलग-अलग पुराने और नये डेरों का उल्लेख आया, जो 7-8 किलोमीटर दूर बताए गए। दोनों जगह “गुफा” होने की बात सामने आई। बचाव पक्ष ने जांच अधिकारी इंस्पेक्टर सतीश डागर की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए।
कहा गया कि उनके खिलाफ पहले से शिकायतें थीं और उन्होंने 2005 में ही ऐसे सवाल तैयार करवा लिए थे, जिनका संबंध कथित प्रेम पत्र और यौन आरोपों से था, जबकि उस समय तक पीड़िता ने दुष्कर्म का आरोप लगाया ही नहीं था। खुराना व अन्यों ने पक्ष रखते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने निर्णय में “असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपाय” जैसे शब्द इस्तेमाल कर कानून की स्थापित कसौटियों से हटकर फैसला दिया।
2017 में ठहराया गया था दोषी
ज्ञात रहे कि डेरे की दो साध्वियों के यौन शोषण मामले में पंचकूला की सीबीआइ कोर्ट ने अगस्त 2017 में डेरा मुखी को दोषी करार देते हुए उसे 10-10 साल की सजा सुनाई थी और साथ ही डेरा मुखी पर 30 लाख 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था। पहले मामले में 10 वर्ष की सजा पूरी होने के बाद दूसरे मामले में 10 वर्ष की सजा शुरू होनी है। सजा को डेरा मुखी ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए अपील दायर की थी।
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