जयपुर। देशभर में एलपीजी सिलेंडर (LPG cylinder) की किल्लत और लंबी कतारों की खबरों के बीच राजस्थान (Rajsthan) का एक गांव ऐसा भी है, जहां लोगों को गैस खत्म होने की चिंता नहीं रहती। यहां के ग्रामीणों ने खुद के बायोगैस प्लांट लगाकर ईंधन की समस्या का स्थायी समाधान निकाल लिया है।
भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील में स्थित मोतीपुर गांव इस अनोखी पहल के लिए चर्चा में है। करीब 200 परिवारों वाले इस गांव में अधिकांश घरों के बाहर व्यक्तिगत बायोगैस प्लांट लगाए गए हैं। इन्हीं प्लांट से तैयार गैस का उपयोग खाना बनाने, पानी गर्म करने और अन्य घरेलू कामों में किया जाता है, जिससे एलपीजी सिलेंडर की जरूरत लगभग खत्म हो गई है।
इतनी गैस कि दूसरों को भी दे सकें
ग्रामीणों का कहना है कि उनके बायोगैस प्लांट से पर्याप्त गैस तैयार हो जाती है, जिससे वे अपनी जरूरतों के साथ पड़ोसियों की जरूरत भी पूरी कर सकते हैं। घर में छोटे-बड़े कार्यक्रमों के दौरान भी सिलेंडर की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अलावा प्लांट से निकलने वाला अवशेष जैविक खाद के रूप में खेतों में इस्तेमाल होता है, जिससे खेती में भी फायदा मिल रहा है।
जैविक कचरे से बनती है बायोगैस
बायोगैस प्लांट एक पर्यावरण अनुकूल तकनीक है, जिसमें गोबर, किचन वेस्ट और अन्य जैविक कचरे से गैस बनाई जाती है। इस गैस में मुख्य रूप से मीथेन होती है, जिसका उपयोग खाना पकाने, पानी गर्म करने और बिजली उत्पादन तक में किया जा सकता है। बचा हुआ पदार्थ जैविक खाद के रूप में उपयोगी होता है।
ऐसे काम करता है प्लांट
बायोगैस प्लांट का सिद्धांत बिना ऑक्सीजन के जैविक कचरे के विघटन पर आधारित है। गोबर और कचरे को पानी के साथ बंद टैंक में डाला जाता है, जहां बैक्टीरिया इसे सड़ाकर गैस उत्पन्न करते हैं। यह गैस ऊपर जमा होकर पाइप के जरिए घरों तक पहुंचती है।
फायदे भी कई, लागत भी कम
बायोगैस प्लांट से ईंधन की बचत, प्रदूषण में कमी और जैविक खाद जैसी सुविधाएं मिलती हैं। शुरुआती लागत और देखभाल की जरूरत जरूर होती है, लेकिन लंबे समय में यह सस्ता और टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है। इसी वजह से मोतीपुर गांव का यह मॉडल अब अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है।
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