
डेस्क: चीन (China) जिस ‘सप्लाई चेन’ को हथियार बनाकर दुनिया को डराता रहा है, अब उस हथियार की धार कुंद करने की तैयारी पूरी हो चुकी है. तकनीक के लिए बेहद अहम ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ और ‘रेयर अर्थ’ (Rare Earths) को लेकर अमेरिका (America) ने एक बड़ी बैठक बुलाई है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, वाशिंगटन में सोमवार को होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक में भारत का पक्ष रखने के लिए मोदी सरकार के दिग्गज मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) पहुंच सकते हैं. यह बैठक इसलिए निर्णायक मानी जा रही है क्योंकि दुनिया की बड़ी ताकतें अब चीन की बादशाहत को खत्म करने के लिए एकजुट हो रही हैं.
अमेरिका ने अब साफ संकेत दे दिया है कि चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए उसे भारत की सख्त जरूरत है. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने पुष्टि की है कि G7 देशों के बैठक में भारत, ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य चुनिंदा देश भी शामिल होंगे. बेसेंट पिछले साल से ही इस मुद्दे पर अलग से चर्चा करने पर जोर दे रहे थे. सबसे बड़ी खबर यह है कि भारत अब अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘पैक्स सिलिका’ (Pax Silica) गठबंधन का भी हिस्सा बनेगा. पहले भारत इसमें शामिल नहीं था लेकिन अब नई दिल्ली में होने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट से ठीक पहले भारत की इसमें एंट्री ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है. इसमें जापान, ब्रिटेन और यूएई जैसे देश पहले से शामिल हैं.
जहां एक तरफ अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ‘रेको डिक’ खदान प्रोजेक्ट में भारी निवेश कर रहा है. अमेरिका ने वहाँ खनन के लिए सवा अरब डॉलर (करीब 1.25 बिलियन डॉलर) की फंडिंग मंजूर की है, जिससे हजारों नौकरियों का वादा किया गया है. भारत के लिए अमेरिका और पाकिस्तान की यह ‘मिनरल दोस्ती’ थोड़ी असहज करने वाली जरूर है लेकिन अपनी ऊर्जा और सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए भारत ने व्यावहारिक रुख अपनाया है और हर उस मंच पर मौजूद रहने का फैसला किया है जहां भविष्य की दिशा तय हो रही है.
ऐसा नहीं है कि भारत अपनी जरूरतों के लिए सिर्फ अमेरिका या पश्चिमी देशों के भरोसे बैठा है. देश के भीतर ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ (NCMM) 2025 के तहत खनिजों की खोज युद्धस्तर पर जारी है. जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ने राजस्थान समेत देश भर में 195 नए प्रोजेक्ट्स हाथ में लिए हैं. सरकार का लक्ष्य साफ है कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलीमेंट्स के लिए आयात पर निर्भरता खत्म करना. इसके लिए 100 से ज्यादा मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की तैयारी है और 7,280 करोड़ रुपये का बजट घरेलू मैन्युफैक्चरिंग ईकोसिस्टम तैयार करने के लिए रखा गया है. इसके अलावा, भारत अब रूस के साथ भी मिलकर नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है.
आपके स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी, और सेना के आधुनिक हथियारों के लिए ये खनिज ‘सांस’ की तरह जरूरी हैं. दिक्कत यह है कि लिथियम, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिजों की 47% से 87% रिफाइनिंग अकेले चीन करता है. चीन जब चाहे सप्लाई रोककर दुनिया की रफ़्तार थाम सकता है. यही वजह है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अब भारत मिलकर एक ऐसा वैकल्पिक रास्ता बना रहे हैं जहां ड्रैगन की मनमानी नहीं चल सकेगी.
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