
तेहरान। अमेरिका-ईरान (US-Iran) के बीच समझौता होना भारत (India) के लिए काफी अहम है। खासकर भारत की ऊर्जा जरूरत के हिसाब से यह समझौता काफी राहत देगा क्योंकि होर्मुज (Hormuz) से पोत का आवागमन सामान्य होगा तो उससे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों (Petroleum products Prices) में कमी आएगी। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि संभावना है कि अगले तीन महीने के अंदर भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी आएगी। इससे घरेलू उद्योग पर महंगे पेट्रोलियम उत्पादों का दबाव कम होग जिसका असर भारत के घरेलू विनिर्माण की कीमतों पर भी सुधार के तौर पर दिखाई देगा। पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि उत्पादन लागत में कमी आएगी। इसके साथ ही उर्वरक आयत में भी सुधार होगा।
आपको बता दें कि अमेरिका- ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर होते ही समुद्री मार्ग होर्मुज में गुरुवार को पोतों की हलचल तेज हो गई। जानकारी के अनुसार कुल दस वाणिज्यिक पोत होर्मुज से गुजरे हैं जबकि फारस की खाड़ी से कई पोत होर्मुज की तरफ बढ़ गए हैं, लेकिन राहत मिलने में अभी महीनों लग सकते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है, यह संकट तुरंत खत्म नहीं होगा। बाजार को पटरी पर लौटने में अभी महीनों लग सकते हैं।
इधर, सऊदी अरब के तेल से भरे तीन सुपर टैंकर और कतर के गैस से भरा टैंकर ने होर्मुज पार कर लिया। टैंकर ट्रैकर की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब के सुपर टैंकर शादेन और जहम करीब दो महीने से फारस की खाड़ी में फंसा हुआ था। समझौते के बाद इसे ओमान की खाड़ी में देखा गया। तीनों टैंकर में करीब 60 लाख बैरल तेल है, जो सऊदी के बंदरगाह जुआमह और रास तनुरा से फरवरी में जंग शुरू होने से एक दिन पहले भरा गया था।
सऊदी अरब तेल निर्यात के लिए मुख्य रूप से लाल सागर बंदरगाह का इस्तेमाल करता है। इसी तरह कतर का पोत मराइख भी फारस की खाड़ी में करीब एक महीने से फंस था। समझौते के बाद गैस से भरा ये टैंकर पाकिस्तानी बंदरगाह कासिम की तरफ बढ़ रहा है।
होर्मुज क्यों है अहम?
होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित लगभग 55 किमी चौड़ा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। होर्मुज में पोतों की गतिविधि शुरू होने के बाद उम्मीद जताई जा रही कि आने वाले समय में तेल से भरे टैंकर संख्या में होर्मुज से निकल सकते हैं।
100 से ज्यादा टैंकर आगे बढ़ने को तैयार
रिपोर्ट के अनुसार, 100 से ज्यादा टैंकर आगे बढ़ने को तैयार हैं। इसमें 30 सुपर टैंकर हैं। एक की क्षमता 20 लाख बैरल है। 17 जून को 26 पोत होर्मुज के आसपास देखे गए। फारस की खाड़ी में 871 टैंकरों की गतिविधि देखी गईं। इसमें सबसे अधिक ईरान के झंडे वाले 128, पनामा के 127, कॉमोरोस के 89 और यूएई के 75 पोत शामिल हैं।
अमेरिका- ईरान में समझौता होने के बाद भी दुनिया भर में तेल-गैस की आपूर्ति सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है, यह संकट रातों-रात खत्म नहीं होगा। बाजार को पटरी पर लौटने में अभी कई महीनों लग सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की पोत से ढुलाई, साफ करने की प्रक्रिया की धीमी रफ्तार इसकी मुख्य वजहें हैं। पहले इन फंसे हुए पोत को बाहर निकाला जाएगा, जिसके बाद ही नए पोत को अनुमति मिल सकेगी।
भंडारण में मदद मिलेगी
अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते से भारत को तीन बड़े फायदे होने की उम्मीद है। पूर्व राजयनिक जाकिर हुसैन का कहना है कि यह तो स्पष्ट है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई से वह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया, जिसके लिए उसने ईरान पर हमला किया था। इसलिए अब उसने कूटनीति का रास्ता चुना है।
अमेरिका हुआ कमजोर?
ईरान के साथ शांति समझौते को आलोचक अमेरिका के लिए कमजोर मान रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि अमेरिका ने अपनी लगभग सारी बढ़त खो दी है और प्रतिबंध हटाकर ईरान को अरबों डॉलर की कमाई का मौका दे दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के परमाणु भविष्य को तय करने वाली अहम 60-दिनों की बातचीत में अमेरिका की स्थिति कमजोर हो सकती है। ट्रंप ने हफ्तों तक ईरान को बमबारी से झुकाने की कोशिश की। उन्होंने ईरान की सभ्यता को नष्ट करने की धमकियां तक दीं। महीनों चली जंग से न तो सरकार बदली और न ही इस्लामिक रिपब्लिक को वॉशिंगटन के पक्ष वाले समझौते के लिए मजबूर किया जा सका। जब कूटनीति ठप पड़ी तो उन्होंने पिछले हफ्ते बॉम्बर और मिसाइलें फिर से तैनात कर दीं। लेकिन बाद में उन्होंने युद्ध से बाहर निकलना बेहतर समझा।
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